सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के फैसले में स्पष्ट किया है कि राजस्व रिकॉर्ड (रेवेन्यू एंट्री) में दर्ज प्रविष्टि से अचल संपत्ति का मालिकाना हक न तो बनता है और न ही समाप्त होता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि राजस्व प्रविष्टियां मुख्य रूप से वित्तीय (राजस्व) उद्देश्यों के लिए होती हैं और म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) का कोई आदेश संपत्ति के अधिकारों के हस्तांतरण या त्याग पत्र के रूप में कार्य नहीं कर सकता। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के उन सहमत फैसलों को बहाल कर दिया, जिनमें दिवंगत रामप्रसाद के कानूनी वारिसों को सह-मालिक मानते हुए संपत्ति के बंटवारे और अलग कब्जे का हकदार ठहराया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मध्य प्रदेश के इंदौर जिले की तहसील और गांव कनाड़िया में स्थित सर्वे नंबर 307 की लगभग 12.41 एकड़ कृषि भूमि और उस पर बने एक मकान से जुड़ा है। यह संपत्ति मूल रूप से भगवानसिंह की थी। उनकी मृत्यु के बाद यह संपत्ति उनके दो बेटों, रामप्रसाद और वासुदेव (प्रतिवादी संख्या 1) को संयुक्त रूप से प्राप्त हुई और राजस्व रिकॉर्ड में दोनों के नाम दर्ज किए गए।
अपीलकर्ताओं (रामप्रसाद की पत्नी जमनाबाई और उनके बच्चों) का कहना था कि रामप्रसाद का संपत्ति में बराबर का मालिकाना हक था। उन्होंने बताया कि रामप्रसाद शराब की लत से ग्रस्त थे और वासुदेव उनके साथ दुर्व्यवहार व मारपीट करता था। इस कारण जमनाबाई उन्हें लेकर अपने मायके चली गईं, हालांकि परिवार को जमीन से कृषि उपज मिलती रही। जब भी वासुदेव से औपचारिक बंटवारे की मांग की गई, वह इसे टालता रहा।
विवाद की मुख्य वजह 26 जनवरी 2008 को दैनिक भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित एक सार्वजनिक नोटिस बनी, जिससे पता चला कि वासुदेव ने सर्वे नंबर 307/02 को बेचने का समझौता किया है। 30 जनवरी 2008 को राजस्व रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां निकालने पर अपीलकर्ताओं को मालूम हुआ कि सर्वे नंबर 307/01 वासुदेव के बेटे जसवंत (प्रतिवादी संख्या 2) के नाम और सर्वे नंबर 307/02 वासुदेव के नाम नामांतरित कर दिया गया है, जबकि रामप्रसाद का नाम रिकॉर्ड से पूरी तरह हटा दिया गया था।
इसके बाद 13 फरवरी 2008 को अपीलकर्ताओं ने सह-स्वामित्व की घोषणा, बंटवारा, अलग कब्जा और संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए दीवानी मुकदमा दायर किया।
प्रतिवादियों का दावा था कि रामप्रसाद को बचपन में उनकी नानी ने गोद ले लिया था और उन्हें अछलूखेड़ी गांव में जमीन मिली थी, जिसे 1980 में बेचकर वासुदेव के साथ संयुक्त रूप से उपाडीनाथा गांव में जमीन खरीदी गई थी। उन्होंने तर्क दिया कि 1981 में पारिवारिक बंटवारा हुआ और 1990 में रामप्रसाद ने उपाडीनाथा की जमीन बेचने की सहमति के बदले कनाड़िया की संपत्ति से अपना अधिकार छोड़ने का हलफनामा (प्रदर्श D19) और नायब तहसीलदार के समक्ष बयान (प्रदर्श D20) दिया था।
इन दस्तावेजों के आधार पर नायब तहसीलदार ने 24 अप्रैल 1990 को नामांतरण आदेश (प्रदर्श D22) पारित कर रामप्रसाद की जगह वासुदेव और जसवंत का नाम दर्ज कर दिया। प्रतिवादियों ने 17 जून 1990 के एक सहमति पत्र (प्रदर्श D5) पर भी भरोसा जताया। रामप्रसाद का निधन 1992 में हो गया था।
निचली अदालतों के फैसले और हाईकोर्ट का रुख
ट्रायल कोर्ट (सिविल जज, क्लास-2, इंदौर) ने 4 मई 2016 को अपीलकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि गोद लेने का दावा साबित नहीं हुआ, उपाडीनाथा जमीन की खरीद-बिक्री में विसंगतियां हैं, प्रदर्श D5 अस्पष्ट एवं अपंजीकृत है और 1990 में रामप्रसाद का नाम हटाने की प्रक्रिया कानून के अनुसार नहीं थी। अदालत ने अपीलकर्ताओं को 1/10वें हिस्से का हकदार माना।
प्रथम अपीलीय अदालत (अतिरिक्त जिला जज, इंदौर) ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 41 नियम 27 के तहत अतिरिक्त राजस्व साक्ष्यों (प्रदर्श D17 से D24) को स्वीकार करने के बाद 2 मई 2019 को निचली अदालत के फैसले की पुष्टि की। अपीलीय अदालत ने पाया कि प्रतिवादी प्रदर्श D5 को साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं कर सके और दस्तावेजों पर रामप्रसाद के हस्ताक्षरों का स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ था।
हालांकि, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर पीठ) ने 9 मई 2025 को दोनों निचली अदालतों के फैसलों को पलट दिया। हाईकोर्ट ने माना कि प्रदर्श D5 के तहत सहमति स्थापित हुई थी, 1990 के म्यूटेशन को 18 वर्षों तक चुनौती नहीं दी गई थी, और इसलिए मुकदमा समय-सीमा (लिमिटेशन) तथा विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा 34 के तहत बाधित था।
पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि म्यूटेशन आदेश एक बिना तारीख वाले बयान (प्रदर्श D20) पर आधारित था, जिसमें नायब तहसीलदार ने रामप्रसाद की उपस्थिति या बयान की प्रामाणिकता की जांच नहीं की थी। उन्होंने कहा कि केवल राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि से मालिकाना हक खत्म नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने सीपीसी की धारा 100 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए निचली अदालतों के तथ्यात्मक निष्कर्षों में हस्तक्षेप किया है।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील ने दलील दी कि 1990 की राजस्व कार्यवाही अर्ध-न्यायिक थी और सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा थी। उन्होंने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 257 का हवाला देते हुए कहा कि इसे सिविल मुकदमे के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि रामप्रसाद की पत्नी (अपीलकर्ता संख्या 1) की गवाही न कराने के कारण उनके खिलाफ विपरीत निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने सीपीसी की धारा 100 के तहत द्वितीय अपील के सीमित दायरे को रेखांकित करते हुए कहा कि निचली अदालतों के तथ्यात्मक निष्कर्षों में केवल तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है जब वे पूरी तरह से विकृत या कानून की गंभीर त्रुटि से ग्रस्त हों।
अधिकार त्याग और राजस्व प्रविष्टियों की वैधता पर अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिकार छोड़ने को साबित करने की जिम्मेदारी प्रतिवादियों पर थी, जिसे वे स्वतंत्र साक्ष्यों से साबित करने में विफल रहे।
राजस्व प्रविष्टियों के कानूनी प्रभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह स्थापित कानून है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि न तो मालिकाना हक पैदा करती है और न ही उसे समाप्त करती है, और यह मुख्य रूप से वित्तीय उद्देश्यों के लिए होती है, जैसा कि इस अदालत ने सावरनी बनाम इंदर कौर और अन्य के मामले में तय किया था।”
अदालत ने आगे कहा:
“मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 117 के तहत राजस्व प्रविष्टि से जुड़ी सत्यता की वैधानिक धारणा एक खंडन योग्य साक्ष्य संबंधी धारणा है, न कि मालिकाना हक की धारणा, और इसे बाकी साक्ष्यों के साथ तौला जाना चाहिए…”
सीमा (समय-सीमा) और सह-स्वामित्व के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक सह-मालिक का कब्जा आमतौर पर सभी सह-मालिकों की ओर से माना जाता है। बेदखली (आउस्टर) को साबित करने के लिए शत्रुतापूर्ण मालिकाना हक का खुला दावा आवश्यक है। समय-सीमा की शुरुआत के संबंध में अदालत ने कहा:
“सीमा (परिसीमा) की समय-सीमा की शुरुआत केवल उस तारीख को तय करके निर्धारित नहीं की जा सकती जिस दिन राजस्व प्रविष्टि की गई थी। मुख्य बात यह है कि वाद दायर करने का अधिकार वास्तव में कब उत्पन्न हुआ, और इस प्रश्न की जांच प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर की जानी चाहिए।”
अदालत ने निचली अदालतों के इस निष्कर्ष को स्वीकार किया कि अपीलकर्ताओं को रामप्रसाद का नाम हटाए जाने की जानकारी 26 जनवरी 2008 के सार्वजनिक नोटिस और 30 जनवरी 2008 को प्राप्त प्रमाणित प्रतियों से ही हुई थी, जिससे 2008 में दायर मुकदमा समय-सीमा के भीतर था।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(e) के तहत सरकारी प्रक्रियाओं की नियमितता की धारणा पर अदालत ने कहा:
“साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(e) के तहत सरकारी प्रक्रियाओं के नियमन की धारणा आधिकारिक प्रक्रियाओं की नियमितता तक ही सीमित है, लेकिन यह अंतर्निहित निजी लेनदेन की प्रामाणिकता को अंतिम रूप से साबित करने तक विस्तारित नहीं होती…”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनः मूल्यांकन करके और निचली अदालतों के सहमत तथ्यात्मक निष्कर्षों से अलग राय बनाकर सीपीसी की धारा 100 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया।
शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए 9 मई 2025 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और 2 मई 2019 के प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले (जिसने 4 मई 2016 के ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि की थी) को बहाल कर दिया। रामप्रसाद के कानूनी वारिसों को उनका घोषित हिस्सा पाने का हकदार ठहराया गया। साथ ही, प्रतिवादियों को कानूनी बंटवारा पूरा होने तक संपत्ति को बेचने या किसी तीसरे पक्ष का अधिकार बनाने से रोक दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: जमनाबाई एवं अन्य बनाम वासुदेव एवं अन्य
वाद संख्या: एसएलपी (सिविल) संख्या 39/2026
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 20 अगस्त 2026

