एलआईसी को लगा झटका, उपभोक्ता आयोग ने विधवा को 50 लाख रुपये का बीमा दावा भुगतान करने का दिया आदेश

आंध्र प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग ने भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) को एक मृतक पॉलिसीधारक की पत्नी को 50 लाख रुपये के जीवन बीमा दावे का भुगतान करने का निर्देश दिया है। आयोग ने एलआईसी द्वारा मृतक के व्यवसाय और आय को छिपाने के आरोपों के आधार पर दावे को खारिज करने को गलत माना है।

राज्य आयोग के पीठ, जिसमें गैर-न्यायिक पीठासीन सदस्य सीवीएस भास्करम और न्यायिक सदस्य बी श्रीनिवास राव शामिल थे, ने एलआईसी की उस अपील को खारिज कर दिया जो विशाखापत्तनम जिला उपभोक्ता आयोग के 5 दिसंबर 2022 के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। जिला आयोग ने महिला की शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसके पक्ष में फैसला सुनाया था।

अनुचित आधार पर दावा खारिज करना सेवा में कमी

14 अगस्त के अपने फैसले में राज्य उपभोक्ता आयोग ने कहा कि एलआईसी द्वारा दावे को खारिज किया जाना पूरी तरह से अनुचित आधारों पर आधारित था और यह बीमा कंपनी की ओर से सेवा में कमी को दर्शाता है। आयोग ने स्पष्ट किया कि जिला उपभोक्ता आयोग के पिछले आदेश में ऐसा कोई दोष नहीं है जिसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।

मूल बीमा राशि के अलावा आयोग ने एलआईसी को मानसिक प्रताड़ना और सेवा में कमी के लिए 50 हजार रुपये का मुआवजा तथा कानूनी खर्च के रूप में 5 हजार रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया है।

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2019 में ली गई थीं दो नीतियां

यह मामला वर्ष 2019 की शुरुआत में लिए गए दो बीमा पॉलिसियों से जुड़ा है। मृतक ने 22 अप्रैल 2019 को 20 लाख रुपये की पहली पॉलिसी ली थी, जिसका प्रीमियम 7,900 रुपये था। इसके बाद 3 मई को 30 लाख रुपये की दूसरी पॉलिसी ली गई, जिसका प्रीमियम 20,190 रुपये था।

पॉलिसीधारक का 15 अगस्त 2019 को विशाखापत्तनम के एक अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया था। पति की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने 50 लाख रुपये के कुल दावे के लिए आवेदन किया, लेकिन एलआईसी ने 31 मार्च 2021 को इस दावे को खारिज कर दिया।

आय और व्यवसाय छिपाने का आरोप साबित करने में विफल

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एलआईसी ने तर्क दिया था कि पॉलिसीधारक ने 30 लाख रुपये की नीति के प्रस्ताव पत्र में खुद को निर्माण श्रमिक बताया था और अपनी वार्षिक आय 10 लाख रुपये बताई थी, जो कि जानकारी छिपाने के समान है।

हालांकि, आयोग ने प्रस्तुत दस्तावेजों और आयकर रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि मृतक की आय काफी अच्छी थी। रिकॉर्ड की समीक्षा में देखा गया कि 19 अप्रैल 2019 के एक प्रस्ताव पत्र में वार्षिक आय 10 लाख रुपये दर्ज थी, जबकि 22 अप्रैल 2019 के एक अन्य फॉर्म में आय 6 लाख रुपये बताई गई थी।

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आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि बीमा कंपनियां केवल गैर-प्रकटीकरण के आरोपों के आधार पर दावे को खारिज नहीं कर सकतीं। कंपनियों को अपने इनकार के कारणों को रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों से साबित करना होगा, जिसमें एलआईसी विफल रही।

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