NEET-PG कट-ऑफ में भारी कमी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, गुणवत्ता पर असर को लेकर मांगा केंद्र से स्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह यह जांच करेगा कि NEET-PG 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में की गई भारी कमी से पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी मुख्य चिंता “शिक्षा की गुणवत्ता” है।

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ कट-ऑफ घटाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। यह कमी नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) की 13 जनवरी की अधिसूचना के माध्यम से काउंसलिंग के तीसरे राउंड के लिए की गई थी।

पीठ ने कहा कि भले ही NEET-PG में आवेदन करने वाले उम्मीदवार पहले से MBBS डिग्रीधारी डॉक्टर हों, फिर भी कट-ऑफ में “इतनी बड़ी कमी” के प्रभाव का परीक्षण आवश्यक है।

अदालत ने कहा,
“शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना हमारी सबसे बड़ी चिंता है… आपको हमें संतुष्ट करना होगा कि कट-ऑफ में इतनी भारी कमी का गुणवत्ता पर बहुत कम असर पड़ेगा।”

पीठ ने यह भी कहा कि NEET-PG, MBBS में प्रवेश जैसा नहीं है क्योंकि उम्मीदवार पहले से डॉक्टर होते हैं, लेकिन इसके बावजूद इस कमी के प्रभाव पर विचार करना जरूरी है।

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मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च को निर्धारित की गई है।

केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि यह निर्णय बड़ी संख्या में खाली रह गई सीटों को भरने के लिए लिया गया है और यह एक नीतिगत फैसला है।

सरकार के हलफनामे के अनुसार:

  • कुल उम्मीदवार: 2,24,029
  • कुल सीटें: लगभग 70,000
  • ऑल इंडिया कोटा सीटें: 31,742
  • दूसरे राउंड के बाद खाली सीटें: 9,621
    • जिनमें 5,213 सीटें सरकारी कॉलेजों में थीं
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सरकार ने कहा कि NEET-PG न्यूनतम क्लिनिकल क्षमता प्रमाणित करने के लिए नहीं है, क्योंकि वह MBBS से पहले ही स्थापित हो जाती है। इसका उद्देश्य सीमित सीटों के लिए उम्मीदवारों की आपसी मेरिट सूची तैयार करना है।

केंद्र ने यह भी कहा कि 2017 से अब तक कई बार पर्सेंटाइल में कमी की गई है और 2023 में तो इसे शून्य तक घटाया गया था, इसलिए यह निर्णय स्थापित प्रशासनिक नीति के अनुरूप है।

NBEMS के अनुसार कट-ऑफ घटाने के बाद 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए। सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ 50वें पर्सेंटाइल से घटाकर 7वें पर्सेंटाइल कर दिया गया।

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याचिकाकर्ताओं—सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन और डॉक्टर सौरव कुमार, लक्ष्य मित्तल व आकाश सोनी—ने कहा कि यह कमी अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है और इससे शैक्षणिक मानकों में गिरावट आएगी।

सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करेगा कि खाली सीटों को भरने की नीतिगत आवश्यकता और मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

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