दिल्ली हाईकोर्ट ने पीड़िता को ‘और अधिक प्रताड़ना’ से बचाने के लिए एफआईआर रद्द की, लेकिन आरोपी की ‘गुंडागर्दी’ पर लगाया 20,000 रुपये का हर्जाना

दिल्ली हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 354D (पीछा करना) के तहत दर्ज एक एफआईआर को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि पीड़िता को मुकदमे के लिए बार-बार कोर्ट बुलाना उसके साथ “और अधिक प्रताड़ना” (Further Victimization) करने जैसा होता। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी के व्यवहार पर सख्त टिप्पणी करते हुए इसे “रोड रेज” और कानून का खुला उल्लंघन करार दिया और उस पर 20,000 रुपये का हर्जाना (Cost) लगाया।

जस्टिस गिरीश कठपालिया की पीठ ने यह आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि न्याय के हित में अब इस मुकदमे को जारी रखना उचित नहीं है, क्योंकि पीड़िता पहले ही काफी परेशान हो चुकी है।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2017 का है, जब वसंत कुंज नॉर्थ पुलिस स्टेशन में एफआईआर संख्या 623/2017 दर्ज की गई थी। पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, घटना 22 अक्टूबर 2017 की है।

जब पीड़िता अपने घर से निकल रही थी, तो याचिकाकर्ता (आरोपी) ने उससे सेक्टर-76 का रास्ता पूछा। पीड़िता ने उसे गार्ड से पूछने की सलाह दी। इसके कुछ समय बाद, जब पीड़िता और उसकी बहन अपनी कार से जा रही थीं और एक ट्रैफिक सिग्नल पर रुकीं, तो आरोपी अपनी मोटरसाइकिल से वहां पहुंचा। उसने अपनी बाइक खड़ी की और अचानक पीड़िता की कार का पिछला बायां दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गया।

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इस हरकत से घबराकर पीड़िता तुरंत कार से बाहर निकली और शोर मचाया। पास के चाय वाले और टैक्सी स्टैंड के लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। यह पूरी घटना सीसीटीवी में कैद हो गई थी।

कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

याचिकाकर्ता प्रशांत कुमार झा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर रद्द करने की मांग की। उसका कहना था कि उसका पीड़िता के साथ समझौता हो गया है। कोर्ट के साथ बातचीत में उसने घटना से इनकार नहीं किया, लेकिन अपने इस व्यवहार के लिए कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दे सका।

दूसरी ओर, राज्य सरकार (अभियोजन पक्ष) ने याचिका का विरोध नहीं किया, लेकिन यह मांग की कि समाज में कड़ा संदेश देने के लिए कोई दंडात्मक आदेश जरूर पारित किया जाना चाहिए।

पीड़िता (प्रतिवादी संख्या 2) भी कोर्ट में पेश हुई। उसने बताया कि वह अब इस मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। उसने कोर्ट को बताया कि वह अपनी गवाही के लिए दो बार निचली अदालत में पेश हो चुकी है, लेकिन गवाही पूरी नहीं हो सकी। अब वह दो छोटे बच्चों की मां है और बार-बार कोर्ट आना उसके लिए संभव नहीं है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और विश्लेषण

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने मामले की गंभीरता पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि दिनदहाड़े किसी महिला की निजी कार में जबरन घुसना उसकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।

आरोपी के आचरण पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा: “मैं सरकारी वकील की इस दलील में दम पाता हूं कि याचिकाकर्ता ने जिस तरह की दबंगई दिखाई है—दो लड़कियों की कार का दरवाजा खोलकर बिना अनुमति अंदर बैठ जाना—उसे सख्ती से देखा जाना चाहिए। कोई भी उस डर की कल्पना कर सकता है जो उन लड़कियों ने महसूस किया होगा।”

कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपी का अपनी मोटरसाइकिल छोड़कर पीड़िता की कार में घुसना सिवाय “सड़क पर गुंडागर्दी” (Road Rage) और कानून की “खुली अवहेलना” के और कुछ नहीं है।

हालांकि, कोर्ट ने अंतिम फैसला पीड़िता की सहूलियत को ध्यान में रखकर लिया। जस्टिस कठपालिया ने माना कि आरोपी पर केस जारी रखना, जो कि किसी सकारात्मक कारण से नहीं बल्कि केवल इसलिए होगा क्योंकि अपराध गंभीर था, अंततः पीड़िता के लिए ही सजा बन जाएगा।

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कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता के खिलाफ अभियोजन को इसलिए रोका जाना चाहिए, क्योंकि प्रतिवादी संख्या 2 (पीड़िता) पहले ही कथित घटना के दौरान काफी भुगत चुकी है और अब वह अपने छोटे बच्चों की देखभाल के कारण और अधिक कोर्ट के चक्कर नहीं लगा सकती।”

फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए एफआईआर और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने शर्त रखी कि याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर जांच अधिकारी (IO) के माध्यम से पीड़िता को 20,000 रुपये का हर्जाना (Cost) देना होगा।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि एक सप्ताह के भीतर हर्जाना नहीं दिया जाता है, तो निचली अदालत में मुकदमा जारी रहेगा। ऐसी स्थिति में, पीड़िता की परेशानी कम करने के लिए उसकी गवाही केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उसके घर से ही कराई जाएगी।

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केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: प्रशांत कुमार झा बनाम दिल्ली सरकार और अन्य
  • केस नंबर: CRL.M.C. 1013/2026
  • कोरम: जस्टिस गिरीश कठपालिया

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