इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को राज्यभर में बढ़ते बंदर संकट से निपटने के लिए एक ठोस और समग्र कार्य योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने दो जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
पीठ ने कहा कि कार्य योजना बनाते समय पर्यावरण विभाग को पशु कल्याण बोर्ड द्वारा तैयार की गई अस्थायी योजना पर भी विचार करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि उत्तर प्रदेश शहरी विकास विभाग के प्रमुख सचिव को इस मामले में पक्षकार बनाया जाए।
यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता विनीत शर्मा और गाजियाबाद निवासी द्वारा दाखिल जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उठा। राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट को सूचित किया कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति की 29 अक्टूबर, 2025 को हुई बैठक में कुछ सिफारिशें की गई थीं, जिनमें राज्य सरकारों को विस्तृत और स्थल-विशेष शमन योजनाएं तैयार करने का निर्देश दिया गया था ताकि बंदरों से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा सके।
हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार के रवैये पर असंतोष जताया। कोर्ट ने टिप्पणी की, “जबकि यह समस्या असंदिग्ध रूप से मौजूद है, उससे निपटने की इच्छा स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है, क्योंकि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की ओर से केवल एक प्रस्ताव ही दिया गया है।”
इससे पहले की सुनवाई में भी कोर्ट ने अधिकारियों की निष्क्रियता पर नाराज़गी जताई थी। कोर्ट ने कहा था, “…सभी उत्तरदाता इस बात से सहमत हैं कि बंदरों का आतंक है और वह आम जनता की ज़िंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है, लेकिन कोई भी विभाग इस संकट से निपटने की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सभी विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने में लगे हैं।”
कोर्ट ने आगे कहा, “राज्य सरकार की ओर से यह कहा गया कि सभी विभागों की बैठक हुई, लेकिन उसमें भी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने का ही प्रयास किया गया।”
कोर्ट ने सभी पक्षों को पूर्व में दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए आवश्यक कार्रवाई करने को कहा और अगली सुनवाई की तारीख 27 फरवरी तय की।

