राइट टू लाइफ का हिस्सा है माहवारी स्वच्छता: सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में फ्री सैनिटरी पैड और अलग शौचालय अनिवार्य किए

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसले में घोषित किया कि माहवारी स्वच्छता (Menstrual Hygiene) का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ और ‘निजता के अधिकार’ का अभिन्न अंग है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़े निर्देश जारी करते हुए स्कूल जाने वाली छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड और पर्याप्त स्वच्छता सुविधाएं सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।

यह मामला नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए एक संज्ञान के बाद शुरू हुआ था। कोर्ट ने हरियाणा की महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी (MDU) में हुई एक विचलित करने वाली घटना पर गौर किया था, जहां तीन महिला सफाई कर्मचारियों को कथित तौर पर अपनी माहवारी साबित करने के लिए सैनिटरी पैड की तस्वीरें भेजने के लिए मजबूर किया गया था। इस “पीरियड-शेमिंग” की घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने एक याचिका दायर की थी, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों और कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले अपमानजनक व्यवहार और बुनियादी सुविधाओं की कमी को रेखांकित किया गया था।

कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश

अदालत ने छात्राओं के स्वास्थ्य, गरिमा और समानता को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं:

  1. मुफ्त सैनिटरी नैपकिन: सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया है कि वे सभी स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त में बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराएं।
  2. अलग शौचालय: सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालयों की व्यवस्था अनिवार्य है। साथ ही, दिव्यांग छात्राओं के लिए भी अनुकूल (disability-friendly) शौचालय होने चाहिए।
  3. निजी स्कूलों पर कार्रवाई: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई निजी स्कूल अलग शौचालय या मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने में विफल रहता है, तो उसकी मान्यता रद्द (derecognition) की जा सकती है।
  4. जवाबदेही: यदि सरकारें इन सुविधाओं को प्रदान करने में विफल रहती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट उन्हें सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराएगा।
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कोर्ट की टिप्पणियां और कानूनी विश्लेषण

जस्टिस जेबी पारदीवाला ने फैसला सुनाते हुए कहा कि माहवारी स्वच्छता कोई दान या नीतिगत विवेक का मामला नहीं है, बल्कि यह गरिमा के साथ जीने के अधिकार से निकलने वाला एक संवैधानिक अधिकार है।

कोर्ट ने कहा, “यह फैसला केवल कानूनी प्रणाली के हितधारकों के लिए नहीं है। यह उन क्लासरूम के लिए भी है जहां लड़कियां मदद मांगने में हिचकिचाती हैं। यह उन शिक्षकों के लिए है जो मदद करना चाहते हैं लेकिन संसाधनों की कमी के कारण नहीं कर पाते हैं। प्रगति इस बात से मापी जाती है कि हम कमजोरों की रक्षा कैसे करते हैं।”

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बेंच ने आगे कहा कि बुनियादी सुविधाओं की कमी और माहवारी से जुड़ा सामाजिक कलंक सीधे तौर पर लड़कियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और निजता को प्रभावित करता है। इससे पहले की सुनवाई में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने भी ऐसी प्रथाओं पर चिंता जताई थी और कहा था कि यदि कोई महिला माहवारी के दर्द के कारण भारी काम करने में असमर्थ है, तो उसे अपमानजनक जांच के बजाय वैकल्पिक व्यवस्था दी जानी चाहिए।

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