इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि लेनदेन (Transaction) के समय आपूर्तिकर्ता (Supplier) का जीएसटी पंजीकरण वैध था, तो बाद में उसका पंजीकरण रद्द हो जाने के आधार पर खरीदार को इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) या रिफंड के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की पीठ ने ‘एडबुलेवार्ड मीडिया प्राइवेट लिमिटेड’ (Adboulevard Media Private Limited) द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य कर विभाग के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत याचिकाकर्ता के रिफंड दावे के एक हिस्से को खारिज कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता कंपनी, एडबुलेवार्ड मीडिया प्राइवेट लिमिटेड, मुख्य रूप से डिजिटल और ऑनलाइन विज्ञापन के व्यवसाय में कार्यरत है। कंपनी ने अप्रैल 2024 से जून 2024 की अवधि के लिए 24 अक्टूबर 2024 को आईटीसी रिफंड के लिए आवेदन किया था।
विभाग ने 21 दिसंबर 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसका याचिकाकर्ता ने जवाब दिया। इसके बाद, प्रतिवादी प्राधिकरण ने 28 दिसंबर 2024 को एक आदेश पारित किया, जिसमें कुल 14,74,910 रुपये के दावे में से केवल 8,79,233 रुपये के दावे को मंजूरी दी गई। शेष राशि को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि आपूर्तिकर्ता फर्म, मेसर्स ऐडटेक इनफिनियम प्रा. लि. (M/s Addtech Infinium Pvt. Ltd.), “लापता” (Untraceable) पाई गई थी।
याचिकाकर्ता ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन एडिशनल कमिश्नर, ग्रेड-2 (अपील) प्रथम, राज्य कर, मेरठ ने 1 जुलाई 2025 को अपील खारिज कर दी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता रजत एरेन और राज कुमार सिंह ने तर्क दिया कि जिस अवधि में लेनदेन हुआ था, उस समय आपूर्तिकर्ता का पंजीकरण सक्रिय था। उन्होंने बताया कि आपूर्तिकर्ता का पंजीकरण बाद में 6 नवंबर 2024 को रद्द किया गया था।
अधिवक्ताओं ने दलील दी कि “आपूर्तिकर्ता का पंजीकरण बाद में रद्द होना, उस लेनदेन के लिए खरीदार के आईटीसी दावे को धोखाधड़ीपूर्ण या अवैध नहीं बनाता है, जो उस अवधि में किया गया था जब उक्त फर्म सक्रिय और पंजीकृत थी।” उन्होंने यह भी कहा कि लेनदेन वैध कर चालान (Tax Invoices), भुगतान के प्रमाण और बही-खाते की प्रविष्टियों द्वारा समर्थित है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कमिश्नर ट्रेड टैक्स बनाम शांति किरण इंडिया प्रा. लि. ((2025) 147 GSTR 235) और इलाहाबाद हाईकोर्ट के मेसर्स सोल्वी एंटरप्राइजेज बनाम एडिशनल कमिश्नर के फैसलों का हवाला दिया।
दूसरी ओर, राज्य-प्रतिवादियों के लिए विद्वान अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता (ACSC) श्री रवि शंकर पांडे ने विभाग द्वारा पारित आदेशों का समर्थन किया।
न्यायालय का विश्लेषण
न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि “इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि जिस समय लेनदेन हुआ, खरीदार यानी याचिकाकर्ता और विक्रेता फर्म दोनों पंजीकृत थे।”
कोर्ट ने नोट किया कि यद्यपि विक्रेता बाद में अस्तित्वहीन पाया गया और उसका पंजीकरण रद्द कर दिया गया, लेकिन पूरक शपथ पत्र (Supplementary Affidavit) से यह रिकॉर्ड पर आया कि मेसर्स ऐडटेक इनफिनियम प्रा. लि. का पंजीकरण रद्दीकरण वापस ले लिया गया था और 16 जनवरी 2025 को कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी।
कोर्ट ने कहा:
“एक बार पंजीकरण बहाल हो जाने के बाद, कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि पक्ष पंजीकृत डीलर नहीं थे।”
सुप्रीम कोर्ट के शांति किरण इंडिया प्रा. लि. मामले का उल्लेख करते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि यदि खरीदार ने वास्तविक रूप से कर का भुगतान किया है और वह एक ‘बोना फाइड’ (Bona fide) खरीदार है, तो उसे आईटीसी के लाभ का हकदार माना जाएगा।
इसके अलावा, कोर्ट ने मेसर्स सोल्वी एंटरप्राइजेज के मामले में अपने स्वयं के निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें यह कहा गया था कि जीएसटी शासन के तहत सभी विवरण पोर्टल पर उपलब्ध हैं, और अधिकारियों को विक्रेता द्वारा जमा किए गए कर का सत्यापन करना चाहिए था, जिसमें वे विफल रहे।
निर्णय
तथ्यों और कानूनी नजीरों को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि विवादित आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं हैं।
न्यायालय ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए एडिशनल कमिश्नर, ग्रेड-2 (अपील) प्रथम द्वारा पारित 1 जुलाई 2025 के आदेश और प्रतिवादी प्राधिकरण द्वारा पारित 28 दिसंबर 2024 के आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया:
“विवादित आदेशों के अनुसरण में जमा की गई कोई भी राशि कानून के अनुसार याचिकाकर्ता को वापस की जाएगी।”
केस विवरण:
केस शीर्षक: एडबुलेवार्ड मीडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम एडिशनल कमिश्नर, ग्रेड-2 (अपील) प्रथम, राज्य कर, मेरठ और अन्य
केस संख्या: रिट टैक्स नं. 6707 ऑफ 2025
बेंच: न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल
याचिकाकर्ता के वकील: रजत एरेन, राज कुमार सिंह
प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी., रवि शंकर पांडे (ए.सी.एस.सी.)

