सोनम वांगचुक की एनएसए हिरासत पर सुनवाई 26 फरवरी तक टली, सॉलिसिटर जनरल की अनुपस्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने किया स्थगित

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई 26 फरवरी तक स्थगित कर दी। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की अनुपस्थिति के कारण मामले को आगे बढ़ाया।

यह याचिका वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो ने दायर की है, जिसमें हिरासत को अवैध, मनमाना और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है।

इससे पहले, पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा था कि वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए क्या हिरासत पर पुनर्विचार की कोई संभावना है।

केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने कहा था कि 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा, जिसमें चार लोगों की मृत्यु हुई और 161 लोग घायल हुए, उसके लिए वांगचुक जिम्मेदार थे।

केंद्र और लद्दाख प्रशासन ने अदालत को बताया कि वांगचुक ने संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में लोगों को उकसाया और युवाओं को विरोध प्रदर्शन के लिए प्रेरित किया।

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केंद्र ने कहा है कि एनएसए के तहत हिरासत आदेश पारित करते समय सभी वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया। सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि वांगचुक ने नेपाल और बांग्लादेश जैसे आंदोलनों की तर्ज पर विरोध प्रदर्शन की बात कही और “अरब स्प्रिंग” जैसे आंदोलन का उल्लेख किया।

एनएसए के तहत किसी व्यक्ति को भारत की सुरक्षा के प्रतिकूल गतिविधियों को रोकने के लिए अधिकतम 12 माह तक निरुद्ध किया जा सकता है, जिसे पहले भी समाप्त किया जा सकता है।

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आंगमो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि पुलिस ने “उधार ली गई सामग्री” और चुनिंदा वीडियो क्लिप्स पर भरोसा कर निरोधक प्राधिकरण को गुमराह किया।

याचिका में कहा गया है कि वांगचुक पिछले तीन दशकों से शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं और उन्हें हिंसा से जोड़ना “पूर्णतः असंगत” है।

याचिका के अनुसार, वांगचुक ने 24 सितंबर की हिंसा की सोशल मीडिया पर निंदा की थी और शांतिपूर्ण आंदोलन पर जोर दिया था।

जोधपुर केंद्रीय कारागार में बंद वांगचुक ने यह भी आरोपों से इनकार किया है कि उन्होंने सरकार गिराने जैसी कोई बात कही थी और कहा कि उन्हें आलोचना और विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार है।

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लद्दाख में राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर 24 सितंबर को हुई हिंसा के दो दिन बाद, 26 सितंबर को वांगचुक को एनएसए के तहत निरुद्ध किया गया था। प्रशासन ने उन्हें हिंसा भड़काने का जिम्मेदार ठहराया है, जिसे याचिकाकर्ता ने विवादित किया है।

मामले की अगली सुनवाई अब 26 फरवरी को होगी।

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