रेलवे भर्ती घोटाला: सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव की याचिका का विरोध किया, कहा– मंत्री का नियुक्तियों से कोई लेना-देना नहीं

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने मंगलवार को ‘जमीन के बदले नौकरी’ घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव द्वारा दर्ज एफआईआर और आरोपपत्रों को रद्द करने की मांग वाली याचिका का दिल्ली हाईकोर्ट में विरोध किया। एजेंसी ने दलील दी कि लालू द्वारा की गई नियुक्तियां उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे में नहीं आतीं और इसलिए भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं थी।

जस्टिस रवींद्र डूडेजा के समक्ष सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने कहा, “हमारा मामला यह है कि लालू प्रसाद अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के तहत कोई सिफारिश या निर्णय लेने के लिए अधिकृत नहीं थे। नियुक्तियों का निर्णय रेलवे के जनरल मैनेजर्स द्वारा लिया जाना था, न कि रेल मंत्री द्वारा।”

उन्होंने कहा, “इसलिए यदि किसी प्रकार की सिफारिश की भी गई हो, तो वह उनके आधिकारिक कार्यों का हिस्सा नहीं थी। इस नाते, धारा 17A के तहत किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं थी।”

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल डी पी सिंह ने अदालत को बताया कि संबंधित जनरल मैनेजरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति प्राप्त कर ली गई है।

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध की है।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने गोवा के म्हादई-कोटीगांव क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया, छह हफ्तों में रिपोर्ट मांगी

CBI ने 18 मई 2022 को लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी, दो बेटियों, कुछ अज्ञात सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। यह मामला 2004 से 2009 के बीच लालू के रेल मंत्री रहते हुए पश्चिम मध्य रेलवे (जबलपुर) क्षेत्र में की गई ग्रुप D की नियुक्तियों से जुड़ा है।

एजेंसी का आरोप है कि नियुक्तियों के बदले उम्मीदवारों या उनके परिजनों ने राजद प्रमुख के परिवार या उनके सहयोगियों के नाम पर जमीनें हस्तांतरित की थीं।

READ ALSO  आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े ने एनसीपी नेता नवाब मलिक के खिलाफ अत्याचार मामले में सीबीआई जांच की मांग की

इस मामले में CBI ने 2022, 2023 और 2024 में तीन आरोपपत्र दाखिल किए हैं।

लालू यादव ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर, तीनों चार्जशीट और संज्ञान लेने के आदेशों को रद्द करने की मांग की है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि CBI ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 17A के तहत अनिवार्य पूर्व अनुमति प्राप्त नहीं की, जिससे पूरी जांच और आरोपपत्र अवैध हो जाते हैं।

याचिका में कहा गया है कि यह एफआईआर 14 साल बाद दर्ज की गई है, जबकि पहले की जांच बंद कर CBI ने समापन रिपोर्ट अदालत में दाखिल कर दी थी। अब बिना उस रिपोर्ट का जिक्र किए नई जांच शुरू करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

याचिका में कहा गया, “बिना धारा 17A की अनुमति के की गई कोई भी जांच या पूछताछ प्रारंभ से ही शून्य है। यह धारा निर्दोष लोगों को राजनीतिक द्वेष और उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाई गई है। यह मामला सत्ता-प्रेरित प्रतिशोध का उदाहरण है।”

READ ALSO  1 अप्रैल से दिल्ली यातायात नियमों में बदलाव, उल्लंघन करने वालों को जेल की सजा हो सकती है- जानिए विस्तार से

याचिका में जांच की प्रक्रिया को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन और क्षेत्राधिकार की त्रुटि बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई है।

मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles