धारा 34 में अवार्ड सही ठहराए जाने के बाद, धारा 37 में हाईकोर्ट अनुबंध की नई व्याख्या नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) की धारा 37 के तहत सुनवाई करते समय, हाईकोर्ट अपनी मर्जी से अनुबंध (Contract) की नई व्याख्या नहीं कर सकता है। यह नियम तब और सख्ती से लागू होता है जब धारा 34 के तहत निचली अदालत ने पहले ही आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के फैसले को सही माना हो।

7 जनवरी, 2026 को दिए गए इस फैसले में जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने ‘जान डी नल ड्रेजिंग इंडिया प्रा. लि.’ के पक्ष में दिए गए आर्बिट्रल अवार्ड को बहाल करते हुए कहा कि जब तक फैसला पूरी तरह से गैरकानूनी न हो, अपीलीय अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद तूतीकोरिन पोर्ट ट्रस्ट और ‘जान डी नल ड्रेजिंग इंडिया’ के बीच एक ड्रेजिंग कॉन्ट्रैक्ट को लेकर था। पोर्ट ट्रस्ट ने 2010 में बंदरगाह की गहराई बढ़ाने का काम सौंपा था।

हालांकि ठेकेदार कंपनी ने तय समय से आठ महीने पहले ही अगस्त 2011 में काम पूरा कर दिया था, लेकिन अंतिम भुगतान को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो गया। मामला आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल (मध्यस्थता न्यायाधिकरण) के पास पहुंचा, जिसने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया।

विवाद का मुख्य केंद्र “क्लेम नंबर 7” था। ट्रिब्यूनल ने कंपनी को “बैकहो ड्रेजर” (Backhoe Dredger) मशीन के खाली खड़े रहने (idling charges) के बदले लगभग 14.66 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया था। कंपनी का कहना था कि पोर्ट ट्रस्ट द्वारा समय पर साइट का कब्जा न देने के कारण उनकी मशीन बेकार खड़ी रही।

READ ALSO  तेलंगाना सरकार ने विधानसभा द्वारा पारित लंबित विधेयकों को अपनी सहमति देने के लिए राज्यपाल को निर्देश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

मद्रास हाईकोर्ट के सिंगल जज ने धारा 34 के तहत इस फैसले को सही ठहराया था। लेकिन जब पोर्ट ट्रस्ट ने धारा 37 के तहत अपील की, तो डिवीजन बेंच ने यह कहते हुए मुआवजा रद्द कर दिया कि अनुबंध के ‘क्लॉज 38’ के मुताबिक केवल “मेजर ड्रेजर” के लिए ही आइडलिंग चार्ज मिल सकता है, और “बैकहो ड्रेजर” इसमें नहीं आता।

सुप्रीम कोर्ट में दलीलें

ड्रेजिंग कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि धारा 37 का दायरा बेहद सीमित है। उनके वकील चंदर यू. सिंह ने कहा कि जब ट्रिब्यूनल ने अनुबंध की शर्तों की व्याख्या कर दी है और उसे धारा 34 कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया है, तो अपीलीय अदालत को दोबारा अपनी व्याख्या थोपने का अधिकार नहीं है।

READ ALSO  एनजीटी ने ग्रेटर नोएडा के 93 गांवों में सीवरेज नेटवर्क पर आगे की कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है

दूसरी ओर, पोर्ट ट्रस्ट के वकील एस. नागामुथु ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल का फैसला “प्रत्यक्ष रूप से अवैध” था क्योंकि अनुबंध की शर्तों के खिलाफ जाकर मुआवजा दिया गया था।

कोर्ट का विश्लेषण और फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने डिवीजन बेंच के दृष्टिकोण को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने मामले को फिर से गुण-दोष (merits) के आधार पर परखने की गलती की है, जो कि उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

जस्टिस पंकज मिथल ने फैसले में लिखा:

“धारा 37 के तहत अपीलीय अदालत का काम केवल यह देखना है कि धारा 34 वाली कोर्ट ने अपनी सीमाओं में रहकर काम किया है या नहीं… अपीलीय अदालत का यह काम नहीं है कि वह ट्रिब्यूनल के फैसले के गुण-दोष की जांच करे कि वह सही है या गलत।”

अनुबंध की व्याख्या पर कोर्ट ने कहा कि भले ही ‘क्लॉज 38’ में केवल मेजर ड्रेजर का जिक्र था, लेकिन अनुबंध में कहीं भी अन्य उपकरणों के लिए मुआवजे की मनाही नहीं थी। ट्रिब्यूनल ने ‘क्लॉज 51.1’ (काम में रुकावट) का सहारा लेकर जो फैसला दिया था, वह एक “संभव और तार्किक दृष्टिकोण” (plausible view) था।

अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर अदालतों को हर चरण में हस्तक्षेप करने की अनुमति दी गई, तो आर्बिट्रेशन एक्ट का पूरा उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आर्बिट्रल अवार्ड को बहाल कर दिया।

READ ALSO  पुणे कार दुर्घटना: किशोर के रक्त के नमूनों से छेड़छाड़, पुलिस ने अस्पताल के कर्मचारियों को गिरफ्तार किया

केस विवरण

  • केस का नाम: जान डी नल ड्रेजिंग इंडिया प्रा. लि. बनाम तूतीकोरिन पोर्ट ट्रस्ट
  • उद्धरण (Citation): 2026 INSC 34
  • बेंच: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस पंकज मिथल

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles