क्या केवल इसलिए नियमितीकरण से इनकार किया जा सकता है क्योंकि प्रारंभिक नियुक्ति स्वीकृत पद के विरुद्ध नहीं थी? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि क्या लंबे समय से कार्यरत अस्थायी कर्मचारियों को केवल इस आधार पर नियमितीकरण देने से इनकार किया जा सकता है कि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति स्वीकृत खाली पदों के विरुद्ध नहीं थी। लोक सेवा नियोजन और प्रशासनिक निष्पक्षता के एक बड़े मामले में, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि राज्य सरकार इस दलील के सहारे नियमितीकरण से मना नहीं कर सकती कि कर्मचारियों को शुरू में स्वीकृत पदों पर नियुक्त नहीं किया गया था, विशेष रूप से तब जब राज्य ने खुद नीतिगत निर्णय के तहत उसी वर्ग के अधिकांश कर्मचारियों को नए पद सृजित कर नियमित कर दिया हो।

न्यायालय ने गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले को खारिज करते हुए सिंगल जज के वर्ष 2013 के आदेश को बहाल किया, जिसमें असम सरकार को 1 अप्रैल, 1993 से पहले नियुक्त मस्टर रोल, वर्क चार्ज्ड और कैजुअल कर्मचारियों को नियमित करने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

असम सरकार ने वर्ष 1980 से लोक निर्माण विकास और सड़क रखरखाव जैसे कार्यों के लिए मस्टर रोल और वर्क चार्ज्ड कर्मचारियों की नियुक्ति शुरू की थी। बढ़ते कार्यभार को देखते हुए, 23 सितंबर, 1983 को असम कैबिनेट ने निर्णय लिया कि 15 साल या उससे अधिक की सेवा पूरी करने वाले सभी मस्टर रोल कर्मचारियों को ग्रेड-IV कर्मचारी के रूप में नियमित किया जाएगा। इसके बाद, प्रशासनिक देरी को दूर करने के लिए मुख्य सचिव ने 20 अप्रैल, 1995 को एक कार्यालय ज्ञापन (O.M.) जारी किया, जिसमें सभी विभागों को 1 अप्रैल, 1993 से पहले नियुक्त मस्टर रोल और वर्क चार्ज्ड कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया।

जब गुवाहाटी हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के समक्ष जितेंद्र कलिता बनाम असम राज्य मामले में 1995 के कार्यालय ज्ञापन की वैधता पर विचार चल रहा था, उसी दौरान असम कैबिनेट ने 22 जुलाई, 2005 को एक बार फिर 1 अप्रैल, 1993 से पहले नियुक्त और निरंतर कार्यरत कर्मचारियों को नियमित करने का नीतिगत निर्णय लिया। इस नीति के तहत वित्त विभाग ने 5,892 वर्क चार्ज्ड ग्रेड पदों और 25,069 ग्रेड-IV पदों के सृजन को मंजूरी दी, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 30,000 कर्मचारियों को नियमित किया गया।

हालांकि, प्रशासनिक अनदेखी, नाम की वर्तनी (spelling) में लिपिकीय त्रुटियों और असावधानी के कारण कुछ पात्र कर्मचारी इस नियमितीकरण प्रक्रिया से बाहर रह गए। इन छूटे हुए कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं (जैसे रमणी डेका बनाम असम राज्य)। इन मामलों की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने मुख्य सचिव के माध्यम से हलफनामा दायर कर स्वीकार किया कि लगभग 3,720 पात्र कर्मचारी अभी भी नियमितीकरण से छूटे हुए हैं और उनके लिए एक विशेष नीति तैयार की जा रही है।

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लेकिन वर्ष 2012 में, राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में एक आवेदन दायर कर यह दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सचिव, कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी (2006) फैसले के कारण इस नीति को लागू करने में कानूनी बाधा उत्पन्न हो गई है। 16 जून, 2012 को वित्त विभाग ने एक नया कार्यालय ज्ञापन जारी कर आगे के नियमितीकरण पर पूरी तरह रोक लगा दी। राज्य ने दलील दी कि ये छूटे हुए कर्मचारी स्वीकृत खाली पदों के विरुद्ध नियुक्त नहीं थे।

हाईकोर्ट के सिंगल जज ने इस 2012 के ओ.एम. को रद्द किया और नियमितीकरण का निर्देश दिया, लेकिन खंडपीठ ने असम राज्य बनाम उपेन दास में इसे उलट दिया। खंडपीठ ने राज्य की दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि चूंकि वे स्वीकृत पदों पर नहीं थे, इसलिए उमादेवी के पैराग्राफ 53 का लाभ उन्हें नहीं मिल सकता।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से:

वरिष्ठ वकील श्री मनीष गोस्वामी और सुश्री अनीता शेनॉय ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि अपीलकर्ता पूरी तरह से उन 30,000 नियमित कर्मचारियों के समान ही थे। राज्य की लिपिकीय त्रुटियों के कारण एक छोटे से हिस्से को बाहर रखना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। उन्होंने दलील दी कि राज्य बनाम एम.एल. केसरी (2010) के तहत एकमुश्त उपाय (one-time measure) तब तक अधूरा माना जाना चाहिए जब तक कि प्रशासनिक अनदेखी के कारण छूटे हुए सभी पात्र कर्मचारियों के मामलों पर विचार न कर लिया जाए।

प्रतिवादी (असम राज्य) की ओर से:

राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील श्री जयदीप गुप्ता ने खंडपीठ के निर्णय का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्ता नियमित कैडर से बाहर और बिना किसी स्थापित प्रक्रिया के नियुक्त हुए थे। राज्य ने कहा कि उमादेवी का फैसला स्वीकृत पदों से इतर नियुक्तियों के नियमितीकरण पर पूरी तरह रोक लगाता है और कोई भी नीतिगत निर्णय इस संवैधानिक नियम का उल्लंघन नहीं कर सकता।

न्यायालय का विश्लेषण: ‘स्वीकृत पद’ की दलील पर सुप्रीम कोर्ट का जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया कि स्वीकृत पदों की कमी नियमितीकरण में बाधा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दशकों तक सेवा लेने के बाद तकनीकी आधार पर कर्मचारियों को बाहर करना न्यायसंगत नहीं है। पीठ ने निर्णय के पैराग्राफ 78 में कहा:

“उपरोक्त पृष्ठभूमि में, हम राज्य की इस दलील को स्वीकार करने में असमर्थ हैं कि अपीलकर्ताओं को केवल इस आधार पर नियमितीकरण का लाभ नहीं दिया जा सकता कि वे शुरू में विधिवत स्वीकृत पदों पर नियुक्त नहीं थे। राज्य ने 1 अप्रैल, 1993 से पहले अपीलकर्ताओं को काम पर रखा, दशकों तक लगातार उनकी सेवाएं लीं, और स्वयं लगभग 30,000 समान रूप से स्थित कर्मचारियों को नियमित करने के लिए कैबिनेट नीति बनाकर उसे लागू किया। ऐसे में राज्य अब उमादेवी मामले की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या के पीछे छिपकर अपीलकर्ताओं को इस दायरे से बाहर नहीं रख सकता। इस तरह के निष्कासन को उचित ठहराने वाले किसी भी ठोस वर्गीकरण या तर्कसंगत निर्णय के अभाव में, राज्य की यह कार्रवाई पूरी तरह से मनमानी है। यह एक आदर्श नियोक्ता (model employer) के रूप में कार्य करने के उसके कर्तव्य के विपरीत है और संविधान के अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ताओं का दावा उमादेवी के पैराग्राफ 53 के तहत अदालती निर्देश पर आधारित नहीं था, बल्कि अनुच्छेद 14 के तहत समान व्यवहार के सिद्धांत पर आधारित था। एक बार जब राज्य ने अपनी नीति के तहत 30,000 कर्मचारियों को नियमित कर दिया, तो वह बचे हुए कर्मचारियों को बाहर नहीं रख सकता था।

उमादेवी मामले की गलत व्याख्या पर टिप्पणी

पीठ ने स्पष्ट किया कि उमादेवी का उद्देश्य पिछले दरवाजे से होने वाली नियुक्तियों को रोकना था, न कि दशकों से सेवा दे रहे कर्मचारियों का शोषण करना। कोर्ट ने जगगो बनाम भारत संघ (2024) और भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य (2026) का हवाला देते हुए दोहराया कि राज्य अस्थाई नामों के सहारे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता।

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आदर्श नियोक्ता के रूप में राज्य का कर्तव्य

न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा अपनी ही घोषित नीति को लागू करने के लिए हाईकोर्ट से अनुमति मांगने के प्रयास को कार्यकारी शक्ति का अनुचित समर्पण बताया। कोर्ट ने कहा कि एक आदर्श नियोक्ता के रूप में राज्य को निष्पक्षता के साथ कार्य करना चाहिए और अदालतों के समक्ष दिए गए आश्वासनों से पीछे नहीं हटना चाहिए।

न्यायालय का निर्णय

अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले को रद्द कर दिया और सिंगल जज के निर्देशों को बहाल किया:

  1. समान नियमितीकरण: अपीलकर्ताओं को 22 जुलाई, 2005 के कैबिनेट निर्णय की तिथि से ही नियमित माना जाएगा, जिस तिथि से अन्य 30,000 कर्मचारियों को लाभ मिला था।
  2. अधिसंख्य पदों का सृजन: असम सरकार पात्र अपीलकर्ताओं की पहचान कर आवश्यकतानुसार उनके लिए व्यक्तिगत अधिसंख्य पदों (supernumerary posts) का सृजन करेगी।
  3. परिणामी लाभ: नियमितीकरण के बाद अपीलकर्ता नियमित वेतनमान, सेवा निरंतरता, और सभी लागू पेंशन व सेवानिवृत्ति लाभों के हकदार होंगे।
  4. सेवानिवृत्त और दिवंगत कर्मी: सेवानिवृत्त अपीलकर्ताओं को पेंशन की पुनर्गणना के लिए केवल सांकेतिक नियमितीकरण और वित्तीय बकाया मिलेगा, तथा दिवंगत कर्मियों के वारिसों को बकाया राशि जारी की जाएगी।
  5. कट-ऑफ तिथि: यह लाभ केवल उन्हीं अपीलकर्ताओं को मिलेगा जो 1 अप्रैल, 1993 से पहले संबंधित विभागों में कार्यरत थे।
  6. समय सीमा: वित्तीय बकाए की गणना और भुगतान सहित पूरी प्रक्रिया फैसले की तिथि से एक वर्ष के भीतर पूरी की जाएगी।
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संबद्ध अपीलें

  • वर्क चार्ज्ड कर्मचारी (सिविल अपील संख्या 4519 और 4520 वर्ष 2025): कोर्ट ने माना कि वर्क चार्ज्ड कर्मचारी मस्टर रोल कर्मचारियों से भिन्न एक अलग श्रेणी हैं। हाईकोर्ट के 2017 के फैसले की उनके प्रतिकूल टिप्पणियों को दरकिनार कर उन्हें अपनी मांगों को राज्य सरकार के सामने रखने की स्वतंत्रता दी गई।
  • अंतर्देशीय जल परिवहन कर्मचारी (सिविल अपील संख्या 4523 वर्ष 2025): 1993-1995 के बीच नियुक्त मस्टर रोल नौका कर्मचारियों के पेंशन दावों को खारिज करने वाले हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर उन्हें उचित मंच पर अपनी बात रखने की छूट दी गई।

केस का विवरण

  • केस का शीर्षक: सुखेंदु भट्टाचार्य और अन्य बनाम असम राज्य और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 4514 वर्ष 2025 (सिविल अपील संख्या 4515, 4516, 4517, 4518, 4519, 4520, और 4523 वर्ष 2025 के साथ)
  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • फैसले की तारीख: 21 मई, 2026

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