सिख वकील ने राजा की शपथ मानने से किया इनकार, कोर्ट ने सरकार को बदलने को कहा नियम

कनाडाई प्रांत अल्बर्टा में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए वहां की शीर्ष अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता को संवैधानिक परंपराओं पर तरजीह दी है। अल्बर्टा कोर्ट ऑफ अपील ने फैसला सुनाया है कि नए वकीलों को किंग चार्ल्स III के प्रति वफादारी की शपथ (Oath of Allegiance) लेने के लिए बाध्य करना उनके अधिकारों का उल्लंघन है।

16 दिसंबर, 2025 को दिए गए इस सर्वसम्मत फैसले में कोर्ट ने माना कि यह अनिवार्यता ‘कनाडाई चार्टर ऑफ राइट्स एंड फ्रीडम’ के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करती है। यह फैसला एडमॉन्टन के सिख वकील प्रभजोत सिंह वायरिंग के लिए एक बड़ी कानूनी जीत है, जिनका बार में प्रवेश केवल इसलिए रुका हुआ था क्योंकि उन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं के चलते किंग के प्रति वफादारी की कसम खाने से इनकार कर दिया था।

तीन जजों की पीठ ने निचली अदालत के 2023 के फैसले को पलटते हुए आदेश दिया कि अनिवार्य शपथ का नियम अब प्रभावी नहीं रहेगा। कोर्ट ने प्रांतीय सरकार को इस नियम में बदलाव करने के लिए 60 दिनों का समय दिया है।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब डलहौजी यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री प्राप्त करने वाले प्रभजोत सिंह वायरिंग अपनी आर्टिकलिंग (इंटर्नशिप) पूरी कर रहे थे। अल्बर्टा में वकालत का लाइसेंस पाने के लिए एक अनिवार्य शर्त थी—ब्रिटिश राजशाही (जो कनाडा के भी राष्ट्राध्यक्ष हैं) के प्रति वफादारी की शपथ लेना।

वायरिंग एक अमृतधारी सिख हैं, जो सिख धर्म की कठोर आचार संहिता का पालन करते हैं। उनका तर्क था कि उनके धर्म के अनुसार, वे केवल ‘अकाल पुरख’ (कालातीत परमात्मा) के प्रति ही पूर्ण समर्पण और निष्ठा रख सकते हैं। किसी सांसारिक राजा के प्रति “सच्ची वफादारी” की शपथ लेना उनके लिए अपने धार्मिक वचनों को तोड़ने जैसा था।

READ ALSO  कंज्यूमर कोर्ट ने बायजू को छात्र को ₹65000 लौटाने और मुआवजा देने का निर्देश दिया

‘प्रतीकात्मक’ नहीं, बल्कि ‘गंभीर बोझ’

वायरिंग ने सबसे पहले 2022 में इस नियम को चुनौती दी थी। 2023 में एक निचली अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। तब जज का कहना था कि किंग के प्रति शपथ लेना केवल एक “प्रतीकात्मक” औपचारिकता है और इससे उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ता।

हालांकि, अल्बर्टा कोर्ट ऑफ अपील ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अपीलीय जजों ने स्पष्ट किया कि यह शपथ केवल रस्म अदायगी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी पेशेवर के भविष्य को उसकी आस्था के विरुद्ध कार्य करने पर निर्भर करना, उस पर “वास्तविक और पर्याप्त बोझ” डालने जैसा है।

READ ALSO  केंद्र ने भारत के 22 वें विधि आयोग का गठन किया- जस्टिस रितु राज अवस्थी होंगे अध्यक्ष

कोर्ट ने पाया कि यह अनिवार्यता चार्टर की धारा 2(a) का उल्लंघन करती है, जो अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा करती है।

कोर्ट का आदेश और प्रभाव

कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया है कि वे या तो शपथ को पूरी तरह समाप्त कर दें, इसे वैकल्पिक बना दें, या इसके शब्दों में बदलाव करें ताकि राजशाही के प्रति अनिवार्य निष्ठा को हटाया जा सके।

इस फैसले का कनाडा के कानूनी समुदाय पर गहरा असर पड़ा है। नागरिक अधिकार संगठनों ने इसका स्वागत किया है, यह कहते हुए कि किसी भी पेशेवर को अपनी आस्था और करियर के बीच चयन करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, संवैधानिक राजशाही के समर्थकों ने इसकी आलोचना की है, जिनका मानना है कि क्राउन (Crown) ही कनाडा में कानूनी सत्ता का स्रोत है और यह शपथ एक महत्वपूर्ण नागरिक प्रतिबद्धता थी।

अल्बर्टा सरकार के पास अब नियमों में संशोधन करने के लिए दो महीने का वक्त है ताकि प्रभजोत सिंह वायरिंग जैसे वकील अपनी आस्था से समझौता किए बिना कानूनी पेशे में शामिल हो सकें।

READ ALSO  लॉ ट्रेंड VIP मेम्बरशिप न्यू ईयर ऑफर: केवल 399 रुपये में एक साल की सदस्यता!
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles