सरांदा वन्यजीव अभयारण्य और ससंगदाबुरू संरक्षण रिजर्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को झारखंड के सरांदा वन्यजीव अभयारण्य (Saranda Wildlife Sanctuary) और ससंगदाबुरू संरक्षण रिजर्व (Sasangdaburu Conservation Reserve) को अधिसूचित करने से संबंधित मुद्दों पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह आदेश अमाइकस क्यूरी के. परमेश्वर, झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद दिया।

अमाइकस क्यूरी ने राज्य सरकार पर अभयारण्य घोषित करने में लंबी देरी का आरोप लगाया और कहा कि प्रस्तावित क्षेत्र को 31,468.25 हेक्टेयर से घटाकर लगभग 24,000 हेक्टेयर किया जा रहा है ताकि निजी खनन कंपनियों को फायदा हो सके।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि झारखंड का 38 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र है और राज्य पर्यावरण संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने SAIL की ओर से कहा कि कंपनी को अपने मौजूदा खदानों से लौह अयस्क (iron ore) खनन जारी रखने की अनुमति दी जानी चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्रीय हित में है। उन्होंने बताया कि SAIL देश की कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं, जैसे ‘चंद्रयान’ मिशन के लिए स्टील उपलब्ध कराता है और उसका अधिकांश लौह अयस्क इन्हीं खदानों से आता है जो प्रस्तावित अभयारण्य क्षेत्र के पास स्थित हैं।

मामला झारखंड के पश्चिम सिंहभूम ज़िले में सरांदा और ससंगदाबुरू वन क्षेत्रों को वन्यजीव अभयारण्य और संरक्षण रिजर्व घोषित करने के प्रस्ताव से जुड़ा है। राज्य सरकार ने पहले अदालत को बताया था कि उसने प्रस्तावित अभयारण्य का क्षेत्र 31,468.25 हेक्टेयर से बढ़ाकर 57,519.41 हेक्टेयर कर दिया है और 13,603.806 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र ससंगदाबुरू संरक्षण रिजर्व के रूप में चिन्हित किया गया है।

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हालांकि, 17 सितंबर को अदालत ने राज्य सरकार की देरी पर नाराज़गी जताई थी और इसे “पूरी तरह अनुचित आचरण” तथा “टालमटोल की रणनीति” बताया था। अदालत ने तब मुख्य सचिव अविनाश कुमार को तलब किया था कि वे बताएं अभयारण्य की अधिसूचना अब तक क्यों नहीं जारी की गई।
बाद में कपिल सिब्बल ने एक सप्ताह का समय मांगा तो सीजेआई गवई ने कहा था, “या तो आप अधिसूचना जारी करें, नहीं तो हम ‘मैंडमस’ जारी कर देंगे। हमें किसी को जेल भेजने में दिलचस्पी नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रूप से SAIL और अन्य कंपनियों को केवल मौजूदा या पहले से लीज़ प्राप्त खदानों से खनन जारी रखने की अनुमति दी है, लेकिन नए खनन पट्टे जारी करने पर रोक लगा दी है।

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पीठ ने सभी पक्षों को निर्देश दिया है कि वे शुक्रवार तक अपनी लिखित दलीलें दाखिल करें, जिसके बाद अदालत अपना निर्णय सुनाएगी।

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम राज्य सरकारों को संरक्षण रिजर्व घोषित करने और उसके प्रबंधन का अधिकार देता है। यह मामला देश के सबसे समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक — सरांदा वन — से जुड़ा है, जहां संरक्षण और खनन हितों के बीच संतुलन पर सर्वोच्च न्यायालय अपना फैसला देगा।

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