सुप्रीम कोर्ट करेगा झूठी गिरफ्तारी और गलत सज़ा के मामलों में मुआवज़े की रूपरेखा तय; 12 साल बाद बरी हुए व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई शुरू

सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम मुद्दे पर विचार शुरू किया है — क्या ऐसे लोगों को मुआवज़ा मिलना चाहिए जिन्हें झूठे मामलों में फंसाकर सालों जेल में सड़ने पर मजबूर किया गया, और बाद में अदालत ने बरी कर दिया? अदालत ने कहा कि कई बार “व्यवस्था के शिकार” बन चुके निर्दोषों के जीवन बर्बाद हो जाते हैं, जबकि राज्य की जिम्मेदारी तय ही नहीं होती।

सोमवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि “गलत गिरफ्तारी, मुकदमा और सज़ा” के मामलों में मुआवज़े के अधिकार पर फैसला दूरगामी असर डालेगा। पीठ ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल दोनों से इस जटिल कानूनी प्रश्न पर सहायता मांगी।

12 साल जेल में बिताए, 6 साल फांसी की सज़ा के साए में

यह मामला महाराष्ट्र के एक गरीब व्यक्ति से जुड़ा है जिसे 2013 में एक नाबालिग के बलात्कार और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 2019 में ठाणे की ट्रायल कोर्ट ने उसे फांसी की सज़ा सुनाई, लेकिन 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि पुलिस ने उसके खिलाफ झूठे और मनगढ़ंत सबूत गढ़े थे।

व्यक्ति ने अब सुप्रीम कोर्ट में मुआवज़े की मांग की है, यह कहते हुए कि उसकी 12 साल की कैद ने उसके जीवन, सम्मान और परिवार—सब कुछ तबाह कर दिया। यह याचिका एनएएलएसएआर, हैदराबाद के Square Circle Clinic की मदद से अधिवक्ता मिहिर सैमसन और यश एस. विजय के माध्यम से दायर की गई।

“यह सिर्फ रिहाई का मामला नहीं, मौलिक अधिकारों का हनन है”

याचिकाकर्ता ने कहा कि उसका झूठा मुकदमा और अवैध कैद संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।

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याचिका में कहा गया, “राज्य के अधिकारियों द्वारा की गई इस अन्यायपूर्ण कार्रवाई ने मेरे जीवन, प्रतिष्ठा और परिवार को पूरी तरह तबाह कर दिया। केवल जेल से रिहा कर देना पर्याप्त नहीं है, राज्य को मेरे साथ हुए नुकसान का उचित प्रतिकार देना चाहिए।”

याचिका में यह भी दलील दी गई कि जब राज्य के अधिकारी किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी राज्य पर ही तय होती है और यह “सख्त दायित्व” (strict liability) का मामला है।

वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम की दलील

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह स्पष्ट दिशानिर्देश तय करे ताकि भविष्य में गलत मुकदमों या झूठी सज़ाओं के शिकार लोगों को मुआवज़ा मिल सके। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ न्याय का नहीं बल्कि संविधान के सम्मान का सवाल है।

उन्होंने 2018 की कानून आयोग की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें न्यायिक भूल (miscarriage of justice) के मामलों में एक विशेष कानून बनाने की सिफारिश की गई थी।

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सभी समान याचिकाएं एक साथ होंगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि इस विषय पर दो अन्य याचिकाएं भी लंबित हैं, जिन्हें अब एक साथ सुना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल व्यक्तिगत न्याय का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की जवाबदेही तय करने का प्रश्न है।

यदि सुप्रीम कोर्ट मुआवज़े के लिए कोई ठोस ढांचा तैयार करता है, तो यह भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है—जहां निर्दोष व्यक्ति की रिहाई ही नहीं, बल्कि उसके खोए हुए वर्षों की कीमत भी तय होगी।

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