केरल सरकार की याचिका पर राज्यपाल की सहमति में देरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई 25 जुलाई तक टाली

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केरल सरकार की उस याचिका पर सुनवाई 25 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दी, जिसमें पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान द्वारा विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी देने में की गई देरी को चुनौती दी गई है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि द्वारा समय मांगे जाने के बाद सुनवाई टाल दी।

केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल ने यह कहते हुए याचिका वापस लेने की कोशिश की कि तमिलनाडु राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय इसी तरह के मुद्दों पर स्पष्ट मार्गदर्शन दे चुका है और राज्यपालों के बिलों पर कार्रवाई के लिए समय-सीमा तय कर चुका है।

हालांकि, अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका वापस लेने का विरोध किया और अदालत से संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति से मांगे गए परामर्श पर निर्णय आने तक इंतजार करने का आग्रह किया। मेहता ने यह भी सुझाव दिया कि केरल की याचिका को राष्ट्रपति परामर्श के साथ जोड़ा जा सकता है।

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वेणुगोपाल ने विरोध को “अजीब” बताते हुए सवाल किया कि यदि याचिकाकर्ता खुद वापस लेना चाहता है तो आपत्ति का क्या औचित्य है। उन्होंने कहा, “इसका मतलब तो यही हुआ कि दोनों पक्षों को फीस मिलेगी।” इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि “अनंतिम रूप से” याचिका वापस लेने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए और अगली सुनवाई की तारीख 25 जुलाई तय की।

केरल सरकार ने पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, यह आरोप लगाते हुए कि तत्कालीन राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान (जो अब बिहार के राज्यपाल हैं) ने कई विधेयकों पर लगभग दो वर्षों तक कोई निर्णय नहीं लिया। राज्य सरकार का कहना था कि सात विधेयकों को अनुचित रूप से राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख दिया गया, जिससे विधानमंडल की अधिकारिता प्रभावित हुई।

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प्रभावित विधेयकों में विश्वविद्यालय अधिनियम (संशोधन) विधेयक, 2021 और 2022, और केरल सहकारी समितियां (संशोधन) विधेयक, 2022 शामिल थे। बाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य को सूचित किया कि राष्ट्रपति ने इनमें से चार विधेयकों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले यह देखा था कि क्या तमिलनाडु राज्यपाल मामले में दिया गया निर्णय — जिसमें 10 विधेयकों को राष्ट्रपति के पास दोबारा भेजने को असंवैधानिक ठहराया गया था और राष्ट्रपति को तीन महीने में निर्णय लेने की समय-सीमा तय की गई थी — केरल मामले पर भी लागू होता है।

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केरल सरकार का तर्क था कि इन सात विधेयकों में से कोई भी केंद्र-राज्य संबंधों से संबंधित नहीं था, इसलिए राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत स्वतंत्र और शीघ्र निर्णय लेने के लिए बाध्य थे। सरकार ने यह भी कहा कि राज्यपाल की निरंतर देरी ने राज्य विधानसभा को “अप्रभावी और व्यर्थ” बना दिया है।

यह मामला राज्यपालों के विवेकाधीन अधिकारों, विधेयकों पर सहमति देने की समय-सीमा और उस स्थिति में जवाबदेही की व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दों को उठाता है जब कार्यपालिका की देरी लोकतांत्रिक विधायी प्रक्रिया को प्रभावित करती है। सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यपालों की संवैधानिक भूमिका पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

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