सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर ग्राम पंचायत कार्यकाल विवाद हाईकोर्ट को सौंपा

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मणिपुर हाईकोर्ट को यह तय करने का निर्देश दिया कि क्या मणिपुर में निर्वाचित ग्राम पंचायत सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद, यदि चुनाव नहीं हुए हैं, तो वे प्रशासनिक समिति या प्रशासक की नियुक्ति की स्थिति में अपने पद पर बने रह सकते हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने देते हुए इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न के समाधान की आवश्यकता पर बल दिया और हाईकोर्ट को तीन महीने की समयसीमा में इस पर फैसला देने को कहा है।

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यह मामला मणिपुर पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 22 की व्याख्या से जुड़ा है, खासतौर पर उस संशोधन के आलोक में जिसमें ग्राम पंचायत सदस्यों के कार्यकाल को लेकर “समाप्त” (cease) शब्द को बदलकर “जारी” (continue) कर दिया गया था। राज्य में व्याप्त अभूतपूर्व हिंसा के चलते समय पर पंचायत चुनाव न हो पाने की स्थिति ने इस प्रशासनिक और कानूनी संकट को जन्म दिया है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने समय पर चुनाव न कराए जा सकने की व्यावहारिक कठिनाइयों को सामने रखा, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से इस मुद्दे की गहन कानूनी समीक्षा करने को कहा। पीठ ने कहा, “चूंकि हम हाईकोर्ट की राय का लाभ लेना चाहते हैं, इसलिए हम इस विशेष अनुमति याचिका का निपटारा करते हैं, और मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया कि वे यह सुनिश्चित करें कि यह मामला जल्द से जल्द एक द्वैधपीठ के समक्ष सूचीबद्ध हो और निर्धारित समयसीमा के भीतर इसका निस्तारण किया जाए।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उस अंतरिम आदेश को चुनौती देने के रूप में आया था, जिसमें मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नए चुनाव होने तक पंचायतों के संचालन के लिए प्रशासनिक समितियां नियुक्त करने की अनुमति दी थी।

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