चार-पाँच बोरे में थे नोट- सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के घर पर मिली भारी नकदी का वीडियो जारी किया

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में वह वीडियो जारी किया है, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित रूप से भारी मात्रा में नकदी बरामद होते हुए दिखाया गया है। यह खुलासा न्यायपालिका में उथल-पुथल पैदा करने वाले घटनाक्रमों की श्रृंखला के बीच सामने आया है, जिसने उच्च पदों पर जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

चौकाने वाली बात तो फायर डिपार्टमेंट के नोट में है, जिसमे लिखा है कि-,

दिनांक 14/03/25 को रात्रि 11:43 बजे एक पीसीआर कॉल के माध्यम से सूचना मिली कि 30 तुगलाक़ क्रेसेंट कोठी के अंदर आग लगी है। ये कोठी माननीय उच्च न्यायालय, दिल्ली के न्यायमूर्ति, श्री यशवंत वर्मा को आवंटित है।

इसमें तुरंत दमकल की दो गाड़ियों को मौके पर बुलाया गया। आग कोठी के एक कोने में चारदिवारी से लगे हुए कुछ कमरे हैं, उनमे लगी थी। इन कमरों का इस्तेमाल स्टोर के रूप में किया जाता था। इन्हीं में से एक कमरे में कोठी पर तैनात कुछ सुरक्षाकर्मी भी रहते हैं। आग पे तुरंत काबू किया गया। प्रथम दृष्टया आग लगने का कारण शार्ट सर्किट बताया जा रहा है।

उक्त कमरे में, आग के काबू में आने के बाद, 4-5 अधजली बोरियां मिली हैं, जिनके अंदर भारतीय मुद्रा भरे होने के अवशेष मिले हैं।

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ये है वीडियो

घटनाक्रम की समयरेखा

14 मार्च 2025: आग की घटना

विवाद की शुरुआत 14 मार्च की रात को हुई जब लुटियन्स दिल्ली स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने की सूचना मिली। दिल्ली फायर सर्विस को रात 11:35 बजे कॉल प्राप्त हुई और टीम ने मौके पर पहुंचकर आग पर काबू पाया। आग मुख्यतः एक स्टोररूम में लगी थी जिसमें स्टेशनरी और घरेलू सामान भरा हुआ था। कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन दमकल कर्मियों को ऑपरेशन के दौरान कथित रूप से बड़ी मात्रा में नकदी मिली।

15-16 मार्च 2025: आरोप सामने आए

प्रारंभिक रिपोर्टों में बताया गया कि न्यायमूर्ति वर्मा के आवास से करीब 15 करोड़ रुपये की बेहिसाबी नकदी मिली है। हालांकि, इसके बाद अलग-अलग दावे सामने आए। दिल्ली फायर सर्विस प्रमुख अतुल गर्ग ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि कोई नकदी नहीं मिली, जिससे पहले की मीडिया रिपोर्टों पर सवाल उठे।

21 मार्च 2025: इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का विरोध

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) ने न्यायमूर्ति वर्मा के तबादले का कड़ा विरोध किया। एसोसिएशन ने एक प्रेस विज्ञप्ति और मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर विरोध दर्ज कराया। अध्यक्ष अनिल तिवारी ने कहा, “इलाहाबाद हाईकोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है कि जिसे वहां भेज दिया गया है।” उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की कमी और नियुक्तियों के अभाव को उठाया और चेतावनी दी कि यदि जरूरत पड़ी तो वे अदालत का कार्य अनिश्चितकाल तक बंद कर देंगे।

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21 मार्च 2025: आंतरिक जांच और प्रक्रिया

दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय ने आंतरिक जांच पूरी कर रिपोर्ट भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को सौंपी। उसी दिन न्यायमूर्ति वर्मा ने अदालत में कार्य नहीं किया, जिससे प्रशासनिक कार्रवाई की गंभीरता स्पष्ट हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने एक दुर्लभ प्रेस नोट जारी कर बताया कि जांच की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अफवाहों को नकारा कि नकदी की बरामदगी से उनका तबादला जुड़ा हुआ है।

22 मार्च 2025: समिति गठित और वीडियो जारी

सीजेआई संजीव खन्ना ने तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जिसमें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी. एस. संधावालिया, और कर्नाटक हाईकोर्ट की न्यायाधीश अनु शिवरामन शामिल हैं। इसी दिन दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देशित किया गया कि वे न्यायमूर्ति वर्मा को कोई भी न्यायिक कार्य न सौंपें, जिससे उन्हें सक्रिय न्यायिक कार्य से अलग कर दिया गया।

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सार्वजनिक और मीडिया दबाव को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने उसी दिन वह वीडियो फुटेज जारी किया जिसमें न्यायमूर्ति वर्मा के आवास से नकदी की गड्डियाँ दिखाई गई हैं। इसका उद्देश्य अफवाहों और गलत जानकारियों को खत्म करना था।

पृष्ठभूमि और पूर्ववर्ती आरोप

एक और महत्वपूर्ण संदर्भ सामने आया जब 2018 के सिंभौली शुगर मिल घोटाले से जुड़े एक सीबीआई एफआईआर में न्यायमूर्ति वर्मा को आरोपी संख्या 10 बताया गया था। यह केस 97.85 करोड़ रुपये की वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में जांच की आवश्यकता नहीं मानी थी, पर धोखाधड़ी पर कार्रवाई की संभावना को खारिज नहीं किया गया था।

22 वर्षों के न्यायिक करियर में न्यायमूर्ति वर्मा ने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। उन्होंने 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट में नियुक्ति से पहले 2014 से इलाहाबाद हाईकोर्ट में सेवा दी। उन्होंने 2018 में डॉ. कफील खान को जमानत देने और 2024 में कर पुनर्मूल्यांकन से जुड़े मामलों में भी निर्णय दिए, जिससे उनकी प्रतिष्ठा बनी। यही वजह है कि मौजूदा विवाद ने और अधिक ध्यान खींचा है।

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