केंद्र सरकार द्वारा सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) के तहत अमरीकी कंपनी मर्क की एचपीवी वैक्सीन ‘गार्डासिल’ को शामिल किए जाने के फैसले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने इस मामले को “बेहद गंभीर” बताते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपर सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा से कहा है कि वे इस टीकाकरण अभियान को सीधे संभाल रहे स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों से पूरी जानकारी लें और अदालत की सहायता करें। इस जनहित याचिका पर अगली सुनवाई 29 जुलाई तय की गई है।
अदालत की गंभीर टिप्पणी और निर्देश
टीकाकरण से जुड़े संभावित दुष्प्रभावों पर चिंता व्यक्त करते हुए बेंच ने कहा कि कोई भी व्यक्ति संक्रमण से बचने के लिए टीका लगवाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सरकार की मंशा पर संदेह नहीं कर रही है, लेकिन यह मामला सभी बच्चियों और महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है। बेंच ने टिप्पणी की कि टीकाकरण एक अच्छी योजना है, लेकिन अगर इसके विपरीत प्रभाव (एडवर्स इवेंट्स) सामने आते हैं, तो सतर्कता बरतना बेहद जरूरी है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें और पूर्व परीक्षणों पर सवाल
यह जनहित याचिका स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सुजाता मित्तल और स्वास्थ्य उद्यमी जितेंद्र चौकसे की ओर से दायर की गई है। अदालत में याचिकाकर्ताओं का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता ज्ञानेंद्र कुमार और अधिवक्ता रोहित कुमार ने रखा। वकीलों ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2009 में गुजरात और आंध्र प्रदेश में एचपीवी वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल किए गए थे, जिसके बाद 2010 में आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले के एक गांव में मौतों की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद 2013 में आई संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में नैदानिक परीक्षणों में गंभीर अनियमितताओं का खुलासा किया गया था, जिसके चलते उस समय इस वैक्सीन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी।
स्वदेशी टीकों की उपेक्षा और सुरक्षा डेटा की मांग
केंद्र सरकार ने इस साल फरवरी में 14 वर्ष की लड़कियों को सर्वाइकल कैंसर से बचाने के लिए चार-स्ट्रेन वाली एचपीवी वैक्सीन की एक मुफ्त खुराक देने की योजना शुरू की थी। मर्क की गार्डासिल 9 वैक्सीन एचपीवी के नौ स्ट्रेन से सुरक्षा प्रदान करती है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, देश में अब तक लगभग 1.15 करोड़ लोगों को यह टीका लगाया जा चुका है, लेकिन इससे जुड़े दुष्प्रभावों का कोई सार्वजनिक डेटा उपलब्ध नहीं कराया गया है।
अदालत में यह सवाल भी उठाया गया कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा निर्मित स्वदेशी जेंडर-न्यूट्रल वैक्सीन ‘सर्वावैक’ को नजरअंदाज क्यों किया गया? जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव राजेश गोखले ने बीते महीने कहा था कि एक खुराक वाली सर्वावैक का अभी क्लिनिकल मूल्यांकन चल रहा है और इसे 2027 के बाद ही राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल किए जाने की संभावना है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि एचपीवी का स्तर किसी महामारी या वैश्विक महामारी जैसा नहीं है, जिसके लिए सुरक्षा निगरानी डेटा सार्वजनिक किए बिना टीका वितरित किया जाए।

