उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर को एक छात्रा को ₹2.55 लाख का मुआवजा देने के आदेश को बरकरार रखा है। आयोग ने माना कि विश्वविद्यालय ने निर्धारित शुल्क लेने के बावजूद छात्रा को उसके शैक्षणिक दस्तावेज जारी नहीं किए।
राज्य आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अजय कुमार श्रीवास्तव और सदस्य सुधा उपाध्याय की पीठ ने 23 जुलाई को विश्वविद्यालय की अपील खारिज कर दी। आयोग ने 12 अक्टूबर 2023 को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, लखीमपुर खीरी द्वारा पारित आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि उसमें ऐसा कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए।
मामला क्या था
रिकॉर्ड के अनुसार, कमलजीत कौर ने मार्च 2013 में प्रोविजनल सर्टिफिकेट और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज प्राप्त करने के लिए दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय में ₹900 जमा किए थे।
छात्रा का आरोप था कि निर्धारित शुल्क लेने के बावजूद विश्वविद्यालय ने उसके दस्तावेज जारी नहीं किए। उसने कहा कि उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए आवश्यक दस्तावेज प्राप्त करने के लिए उसने कई बार विश्वविद्यालय से संपर्क किया, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला।
दस्तावेज न मिलने से मानसिक पीड़ा और आर्थिक नुकसान होने का दावा करते हुए उसने लखीमपुर खीरी के जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और इसे सेवा में कमी बताया।
जिला आयोग का फैसला
साक्ष्यों पर विचार करने के बाद जिला उपभोक्ता आयोग ने 12 अक्टूबर 2023 को छात्रा के पक्ष में फैसला सुनाया।
आयोग ने विश्वविद्यालय को आवश्यक शैक्षणिक दस्तावेज जारी करने का निर्देश दिया और मानसिक उत्पीड़न तथा परेशानियों के लिए ₹2.50 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके अलावा वाद व्यय के रूप में ₹5,000 भी देने को कहा, जिससे कुल राहत राशि ₹2.55 लाख हो गई।
जिला आयोग ने माना कि निर्धारित शुल्क प्राप्त करने के बावजूद विश्वविद्यालय ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की।
राज्य आयोग ने अपील खारिज की
जिला आयोग के आदेश को चुनौती देते हुए दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की और आदेश को गलत बताते हुए उसे निरस्त करने की मांग की।
राज्य आयोग ने रिकॉर्ड और पक्षकारों की दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि जिला आयोग के निष्कर्ष उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित हैं और आदेश में कोई ऐसी कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है, जिसके कारण उसमें हस्तक्षेप किया जाए।
इसके साथ ही आयोग ने विश्वविद्यालय की अपील खारिज कर दी। परिणामस्वरूप, छात्रा के पक्ष में दिया गया ₹2.55 लाख का मुआवजा और शैक्षणिक दस्तावेज जारी करने का निर्देश यथावत रहेगा।

