कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि भले ही पत्नी की अपनी स्वतंत्र और अच्छी आय हो, लेकिन पिता अपने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। जस्टिस रवि वी. होसमनी की एकल पीठ ने निचली अदालतों के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें एक व्यक्ति को उसके दो नाबालिग बेटों के लिए हर महीने 2,000-2,000 रुपये का भरण-पोषण भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने पिता द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया।
कानून और पर्सनल लॉ के तहत पिता का कर्तव्य
16 जुलाई को दिए अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद होने की स्थिति में नाबालिग बच्चे दोनों से भरण-पोषण पाने के हकदार हैं। कोर्ट ने रेखांकित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 और मुस्लिम पर्सनल लॉ (मोहम्मडन लॉ) दोनों ही व्यवस्थाओं में पिता का अपने बच्चों के प्रति वित्तीय दायित्व निरंतर और स्वतंत्र रहता है। सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का संदर्भ देते हुए पीठ ने दोहराया कि जब तक बेटे बालिग या वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो जाते, तब तक पिता उन्हें गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य है, चाहे बच्चे मां के साथ ही क्यों न रह रहे हों।
आय छुपाने और सुबूत न देने पर टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान पिता ने दलील दी थी कि वह एक उर्दू स्कूल में केवल दिहाड़ी शिक्षक के तौर पर कार्यरत है और उसकी वित्तीय स्थिति सीमित है। हालांकि, वह अपनी कम आय को साबित करने के लिए सैलरी सर्टिफिकेट या अन्य कोई प्रामाणिक दस्तावेज पेश करने में विफल रहा। इसके विपरीत, मामले के रिकॉर्ड से यह सामने आया कि याचिकाकर्ता का मासिक वेतन 20,000 रुपये से अधिक था, उसके पास अपना घर व कृषि भूमि थी और वह अन्य स्रोतों से प्रतिमाह 25,000 रुपये से अधिक की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहा था। पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद उसने बच्चों को वित्तीय सहायता नहीं दी थी।
विवाद की पृष्ठभूमि और निचली अदालतों का रुख
यह मामला साल 2008 में हुए विवाह के बाद उत्पन्न पारिवारिक विवाद से जुड़ा है। सरकारी स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्यरत पत्नी ने आरोप लगाया था कि उसके पति ने दहेज के लिए उसका उत्पीड़न किया, परिवार की उपेक्षा की और 2012 से कोई वित्तीय मदद नहीं दी। दूसरी ओर, पति ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि दहेज की शिकायत में पुलिस द्वारा ‘बी’ रिपोर्ट (साक्ष्य न मिलने पर दाखिल क्लोजर रिपोर्ट) लगाए जाने के बाद उसकी पत्नी ने बदले की भावना से यह याचिका दायर की है। उसने तर्क दिया था कि चूंकि उसकी पत्नी के पास स्थायी सरकारी नौकरी है, इसलिए उस पर भरण-पोषण का भार नहीं डाला जाना चाहिए।
फैमिली कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत दोनों ने ही पति के तर्कों को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने भी निचली अदालतों के आकलन को सही मानते हुए कहा कि बच्चों की जरूरतों और दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति के अनुसार तय की गई 2,000 रुपये प्रति बच्चा प्रतिमाह की राशि न तो अत्यधिक है और न ही अनुचित।

