दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने सोमवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत को उनके उच्चतम न्यायिक पद पर पदोन्नयन के अवसर पर सम्मानित करते हुए कहा कि उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि संघर्ष विशेषाधिकारों पर भारी पड़ सकता है।
दिल्ली बार काउंसिल द्वारा हाईकोर्ट परिसर में आयोजित सम्मान समारोह में बोलते हुए जस्टिस उपाध्याय ने कहा, “एक प्रथम पीढ़ी के वकील के रूप में, जिन्होंने हरियाणा के हिसार जिले की जिला अदालत से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में चंडीगढ़ जाकर अपनी स्वतंत्र प्रैक्टिस स्थापित की — यह leap of faith ही था। उनके पास कोई पारिवारिक समर्थन नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने विश्वास और मेहनत से अपना launch pad खुद तैयार किया।”
उन्होंने कहा, “न केवल उन्होंने वकालत में उत्कृष्टता प्राप्त की, बल्कि हरियाणा राज्य के लिए सबसे कम उम्र के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) बनकर उन्होंने glass ceiling को भी तोड़ा। आज जो युवा कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, उनके लिए जस्टिस सूर्यकांत की कहानी एक प्रेरणा है।”
जस्टिस उपाध्याय ने मुख्य न्यायाधीश की विनम्रता की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “इस यात्रा से हमें यह सीखना चाहिए कि संघर्ष हमेशा विशेषाधिकारों से आगे होता है। जस्टिस सूर्यकांत की सबसे खास बात उनकी नम्रता है — वे जिस सहजता से सबको अपने साथ जोड़ लेते हैं, वह उन्हें औरों से अलग बनाता है।”
उन्होंने जोड़ा, “उन्होंने भले ही आसमान छू लिया हो, लेकिन आज भी उनके पैर ज़मीन पर हैं — और यही चीज़ बताती है कि CJI की कुर्सी पर बैठा यह व्यक्ति भीतर से कैसा इंसान है।”
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरपर्सन और राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा ने भी समारोह में भाग लिया और कहा कि CJI सूर्यकांत का दृष्टिकोण न्यायिक क्षेत्र में लैंगिक समानता के लिए हमेशा स्पष्ट और प्रभावी रहा है। उन्होंने बताया कि राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्देश भी जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व में ही आया था।
मिश्रा ने कहा, “लोकतंत्र निष्पक्ष और समावेशी चुनावी प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए — इस सिद्धांत के सशक्त प्रवक्ता रहे हैं जस्टिस सूर्यकांत। उन्होंने महिलाओं को बार काउंसिल और बार एसोसिएशनों में प्रतिनिधित्व दिलाने की दिशा में कई अहम आदेश दिए हैं।”
जस्टिस सूर्यकांत ने 24 नवंबर, 2025 को भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। अपने करियर में वे कई ऐतिहासिक निर्णयों का हिस्सा रहे हैं, जिनमें गवर्नरों की समयसीमा हटाने पर राष्ट्रपति संदर्भ मामला, अनुच्छेद 370 हटाने को चुनौती, बिहार मतदाता सूची संशोधन, पेगासस जासूसी मामला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकता अधिकार जैसे विषय शामिल हैं।
यह समारोह न केवल पदोन्नयन का उत्सव था, बल्कि यह उस जीवन यात्रा की भी सराहना थी, जिसने यह दिखाया कि अगर संकल्प और मेहनत हो, तो कोई भी व्यक्ति व्यवस्था के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है — भले ही उसकी शुरुआत किसी छोटे से गांव की अदालत से ही क्यों न हुई हो।

