सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गुजरात सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 2025 के वडोदरा कार हादसे के आरोपी रक्षित रवीश चोरसिया की जमानत को चुनौती दी गई थी। 23 वर्षीय कानून के छात्र पर नशीली दवाओं के प्रभाव में लापरवाही से गाड़ी चलाने का आरोप है, जिसके कारण एक महिला की मौत हो गई थी और नौ अन्य लोग घायल हो गए थे।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसके तहत आरोपी को जमानत दी गई थी। पीठ ने टिप्पणी की कि आरोपी पहले ही नौ महीने जेल में बिता चुका है और यह घटना ‘जानबूझकर या स्वैच्छिक’ नहीं थी।
यह मामला 14 मार्च 2025 का है, जब वडोदरा के करेलीबाग इलाके में मुक्तानंद चौराहे के पास एक तेज रफ्तार कार ने कई दोपहिया वाहनों को टक्कर मार दी थी। आरोपी रक्षित चोरसिया, जो मूल रूप से वाराणसी का निवासी है और शहर में पीजी (PG) में रहकर कानून की पढ़ाई कर रहा था, गाड़ी चला रहा था।
मीडिया द्वारा एक्सेस किए गए सीसीटीवी फुटेज में देखा गया कि तेज रफ्तार कार ने दो स्कूटरों को टक्कर मारी और सवारों को काफी दूर तक घसीटा। इस हादसे में हेमाली पटेल नामक महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि नौ अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हादसे के बाद वहां मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले करने से पहले उसकी पिटाई भी की।
गुजरात सरकार की ओर से पेश वकील स्वाति घिल्डियाल ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी समाज के लिए खतरा है और वह नशीली दवाओं का आदी है। उन्होंने यह भी बताया कि आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत एक और एफआईआर दर्ज है।
घिल्डियाल ने अदालत को बताया कि हादसे के बाद आरोपी के व्यवहार में कोई पछतावा नहीं था। उन्होंने कहा, “तीन टक्करों के बाद आरोपी कार से बाहर आया और चिल्लाने लगा— ‘एक और राउंड, एक और राउंड’। उसे अपने किए पर बिल्कुल भी पछतावा नहीं था।” उन्होंने सवाल उठाया कि नशीली दवाओं का सेवन आरोपी के पक्ष में कैसे जा सकता है, जबकि वह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 पार्ट II के तहत आरोपित है, जिसमें 10 साल तक की सजा का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों से असहमति जताई। पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी की 23 वर्ष की आयु जमानत देने के लिए एक प्रासंगिक आधार थी।
अदालत ने कहा कि आरोपी पहले ही नौ महीने की हिरासत काट चुका है और चूंकि यह कृत्य स्वैच्छिक या जानबूझकर किया गया नहीं था, इसलिए उसे आगे जेल में रखने का कोई ठोस आधार नहीं है। इसी के साथ, शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के 22 दिसंबर के आदेश के खिलाफ दायर राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

