सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में यूपी की बुलडोजर कार्रवाई को बताया ‘अमानवीय और गैरकानूनी’, किताबों के साथ भागती बच्ची का वीडियो बना आधार

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को 2021 में अंबेडकर नगर में हुई बुलडोजर कार्रवाई को लेकर कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने इस कार्रवाई को “अमानवीय और गैरकानूनी” करार दिया है। न्यायाधीशों ने एक वायरल वीडियो का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिसमें एक आठ वर्षीय बच्ची अपने किताबों को कसकर पकड़े हुए, झोपड़ियों को गिराते बुलडोजर से भागती नजर आती है।

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति ए.एस. ओका की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, “एक वीडियो है जिसमें छोटी-छोटी झोपड़ियों को बुलडोजर से गिराया जा रहा है और एक छोटी बच्ची अपनी किताबों के साथ भाग रही है। यह दृश्य किसी को भी झकझोर कर रख देता है।” यह वीडियो उन लोगों पर हुए मानसिक और सामाजिक प्रभाव को उजागर करता है, जो इस कार्रवाई से प्रभावित हुए।

पीठ ने प्रयागराज नगर निगम के कामकाज पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह कार्रवाई जिस जमीन को खाली कराने के लिए की गई थी, उसे पहले गैंगस्टर-नेता अतीक अहमद की संपत्ति बताया गया था। लेकिन अदालत में यह स्पष्ट हुआ कि कई वैध मकान मालिक, जिनमें एक वकील और एक प्रोफेसर भी शामिल हैं, इस तोड़फोड़ की चपेट में आ गए। इस आधार पर अदालत ने याचिका दायर करने वाले प्रत्येक पीड़ित को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

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यह वीडियो राजनीतिक बहस का भी केंद्र बना रहा। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए भाजपा सरकार पर निशाना साधा। यादव ने अपने पोस्ट में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारों की आलोचना करते हुए कहा कि जब एक बच्ची अपनी किताबें बचाने के लिए भागने को मजबूर हो, तो ऐसे नारे केवल खोखले लगते हैं।

वहीं, अंबेडकर नगर पुलिस ने इस कार्रवाई को अतिक्रमण हटाने के लिए जरूरी बताया और कहा कि यह जलालपुर तहसीलदार के आदेश पर की गई थी। पुलिस ने दावा किया कि यह राजस्व न्यायालय के निर्देशों के तहत की गई कार्रवाई थी और पहले से नोटिस जारी किए गए थे।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि नोटिस देने की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। अदालत ने कहा, “18 दिसंबर 2020 को जारी किया गया नोटिस महज एक कारण बताओ नोटिस था, जबकि राज्य की ओर से दाखिल जवाब में झूठे तौर पर दावा किया गया कि संबंधित लोगों को उसी दिन सुबह 11 बजे पेश होने के लिए कहा गया था।” कोर्ट ने इसे अपर्याप्त नोटिस अवधि करार दिया।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कार्रवाई न केवल नागरिकों के ‘आवास के मौलिक अधिकार’ का उल्लंघन थी, बल्कि इसे बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के अंजाम दिया गया। अदालत ने अपने फैसले में कानून के शासन और प्रभावित पक्षों को जवाब देने का समुचित अवसर देने की आवश्यकता को रेखांकित किया। साथ ही प्रयागराज विकास प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह सभी प्रभावित पक्षों को छह हफ्तों के भीतर 10-10 लाख रुपये मुआवजा अदा करे।

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