सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दौरान हुई सांप्रदायिक झड़प में मारे गए 26 वर्षीय तरुण बुटोलिया के परिवार की सुरक्षा से जुड़ी याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने परिवार को अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं के लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर से संपर्क करने का निर्देश दिया है। तीन जजों की पीठ ने एक युवा की “असामयिक मृत्यु” पर सहानुभूति व्यक्त की, लेकिन मामले की सीबीआई (CBI) जांच के आदेश देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि स्थानीय पुलिस को अपनी जांच जारी रखने देनी चाहिए ताकि बल का “मनोबल न गिरे।”
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की पीठ ने तरुण बुटोलिया के परिवार को दिल्ली पुलिस कमिश्नर के समक्ष एक “विस्तृत आवेदन” देने की छूट दी है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस कमिश्नर खतरे के आकलन के आधार पर उचित सुरक्षा उपाय करेंगे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पुलिस इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से हल नहीं करती है, तो याचिकाकर्ता दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
यह मामला 4 मार्च, 2026 को राजधानी के उत्तम नगर इलाके में हुई एक हिंसक झड़प से जुड़ा है। मामले के विवरण के अनुसार, दो पड़ोसी समुदायों के परिवारों के बीच विवाद तब शुरू हुआ जब एक छोटी बच्ची द्वारा फेंका गया पानी का गुब्बारा दुर्घटनावश दूसरे समुदाय की एक महिला को लग गया।
यह मामूली विवाद जल्द ही एक घातक संघर्ष में बदल गया, जिसमें 26 वर्षीय तरुण बुटोलिया की जान चली गई। इस घटना के बाद इलाके में काफी तनाव फैल गया था और विरोध प्रदर्शन के दौरान आरोपियों से जुड़े दो वाहनों को आग लगा दी गई थी। पुलिस ने इस मामले में अब तक कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने शुरुआत में सीबीआई जांच और पीड़ित परिवार की सुरक्षा के लिए विशिष्ट निर्देश देने की मांग की थी। हालांकि, पीठ ने सुरक्षा चिंताओं को “प्रशासनिक मुद्दा” करार दिया जो शहर की पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है।
केंद्रीय एजेंसियों के अत्यधिक कार्यभार का जिक्र करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “हर दिन सीबीआई के लोग आते हैं और अपने हाथ खड़े कर देते हैं… उनके पास पहले से ही बहुत काम है।”
जब वकील ने स्पष्ट किया कि उनकी मुख्य चिंता परिवार की सुरक्षा है न कि केवल सीबीआई जांच, तो चीफ जस्टिस ने दिल्ली पुलिस की कार्यक्षमता का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “कृपया दिल्ली हाईकोर्ट जाएं। जांच चल रही है। दिल्ली पुलिस एक पेशेवर पुलिस बल है। इस तरह पूरे बल का मनोबल न गिराएं।”
सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि इसमें “कोई दो राय नहीं” है कि पुलिस अधिकारी परिवार की सुरक्षा जरूरतों का मूल्यांकन करेंगे और आवश्यक उपचारात्मक कदम उठाएंगे। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि प्रशासनिक और सुरक्षा मामलों के लिए उचित कानूनी रास्ता पहले पुलिस कमिश्नर और उसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट है।
कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- परिवार को पुलिस कमिश्नर को एक विस्तृत आवेदन देने की अनुमति है।
- पुलिस से अपेक्षा की जाती है कि वह खतरे के आकलन के आधार पर “आवश्यक उपचारात्मक उपाय” करेगी।
- यदि आवश्यक हो, तो आगे की राहत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी गई है।

