सुप्रीम कोर्ट मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है, जिसमें तिरुपरंगुंड़म पहाड़ी पर स्थित एक प्राचीन पत्थर के स्तंभ (दीपथून) पर पारंपरिक दीप जलाने की अनुमति दी गई थी। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने इस मामले में मूल याचिकाकर्ता रामा रविकुमार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
राज्य सरकार की याचिका और सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की इस याचिका को एक अन्य लंबित मामले के साथ जोड़ते हुए आगे की कार्यवाही स्थगित कर दी। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के 6 जनवरी के आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 1 दिसंबर 2025 के सिंगल जज के उस फैसले को सही ठहराया था, जिसमें वार्षिक त्योहार के दिन पहाड़ी पर दीप जलाने का निर्देश दिया गया था।
कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला रामा रविकुमार और अन्य द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने नवंबर और दिसंबर के दौरान मनाए जाने वाले वार्षिक कार्तिक दीपम उत्सव में तिरुपरंगुंड़म पहाड़ी पर बने प्राचीन स्तंभ पर पवित्र दीप जलाने की अनुमति मांगी थी। 1 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट के सिंगल जज ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए दीप जलाने की अनुमति प्रदान की थी।
इसके बाद राज्य सरकार, मंदिर प्रबंधन और हजरत सुल्तान सिकंदर बादशाह औलिया दरगाह ने सिंगल जज के फैसले के खिलाफ अपील दाखिल की। राज्य सरकार का तर्क था कि पहाड़ी पर दरगाह के पास दीप जलाने से सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है और कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी हो सकती है।
सुरक्षा चिंताओं पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 6 जनवरी के अपने फैसले में प्रशासन की सुरक्षा संबंधी आशंकाओं को पूरी तरह से खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा कि इस धार्मिक परंपरा के कारण शांति भंग होने की बात केवल सुविधा के लिए गढ़ा गया एक काल्पनिक भूत है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस स्थान पर दीपथून स्थित है, वह भूमि श्री सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर की है और इसमें वक्फ बोर्ड का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
अदालत ने टिप्पणी की कि मंदिर की भूमि पर वर्ष में एक दिन दीप जलाने से सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हास्यास्पद और अविश्वसनीय है। पीठ ने कहा कि ऐसा केवल तभी हो सकता है जब राज्य खुद ऐसी गड़बड़ी को प्रायोजित करे। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि कोई भी सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को हासिल करने के लिए इस स्तर तक न गिरे।
वक्फ बोर्ड का दावा और बातचीत की जरूरत
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि अपील की सुनवाई के दौरान वक्फ बोर्ड की ओर से पहली बार यह शरारतपूर्ण तर्क रखा गया कि दीप स्तंभ दरगाह का है। अदालत के अनुसार, इस दावे ने ही मध्यस्थता के प्रस्तावों पर संशय पैदा किया। हाईकोर्ट ने कहा कि जिला प्रशासन को इस स्थिति का उपयोग दोनों समुदायों के बीच शांतिपूर्ण और सार्थक बातचीत के माध्यम से मतभेद सुलझाने के अवसर के रूप में करना चाहिए था।

