चेक बाउंस मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: जस्टिस सूर्य कांत के हस्तक्षेप से बीमार एकल महिला को मिली मुफ्त कानूनी सहायता

न्यायिक पहुंच और न्याय के दरवाजे हर नागरिक के लिए खुले होने की मिसाल पेश करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश की एक बीमार और आर्थिक रूप से कमजोर एकल महिला को बड़ी राहत प्रदान की है। चेक बाउंस के एक मामले में तीन निचली अदालतों द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद, महिला के पास उम्मीद की कोई किरण नहीं बची थी, लेकिन राष्ट्रीय विधिक सेवा समिति (National Legal Services Committee) के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, जस्टिस सूर्य कांत के सीधे हस्तक्षेप के बाद, उन्हें विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने के लिए मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान की गई है।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के सुंदर नगर की रहने वाली कुसुम शर्मा एक तलाकशुदा और बीमार महिला हैं, जिनके पास आय का कोई साधन नहीं है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा उनकी सजा को बरकरार रखे जाने के बाद वह कानूनी रूप से असहाय महसूस कर रही थीं।

याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता महेश शर्मा, जो यह केस मुफ्त में लड़ रहे थे, के अनुसार सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं था। शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट की मुफ्त कानूनी सहायता समिति और मंडी की जिला विधिक सहायता समिति को भेजे गए आवेदनों पर कोई सुनवाई नहीं हुई थी।

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जेल जाने के डर और दिल्ली में मुकदमे का खर्च उठाने में असमर्थता के चलते, बचाव पक्ष ने सीधे जस्टिस सूर्य कांत को एक आवेदन लिखा। यह कदम निर्णायक साबित हुआ। इसके बाद न्याय विभाग के सचिव ने कुसुम शर्मा से संपर्क किया, उनके दस्तावेजों को प्रोसेस किया और उनका पक्ष रखने के लिए एक सरकारी वकील नियुक्त किया।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई सबसे बड़ी राहत ‘सरेंडर’ यानी आत्मसमर्पण से छूट है। सामान्य कानूनी प्रक्रिया के अनुसार, किसी भी दोषी व्यक्ति को एसएलपी (SLP) दायर करने से पहले अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करना होता है।

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हालांकि, अधिवक्ता महेश शर्मा ने बताया कि कुसुम शर्मा की खराब स्वास्थ्य स्थिति और वित्तीय तंगी को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सरेंडर करने से छूट दे दी है। अब बिना जेल गए ही उनकी याचिका पर सुनवाई की जाएगी। यह कदम न्यायपालिका की संवेदनशीलता को दर्शाता है।

यह कानूनी लड़ाई 31 दिसंबर, 2021 को शुरू हुई थी, जब सुंदरनगर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कुसुम शर्मा को दोषी ठहराया था। उन्हें नौ महीने की कैद और 2,25,000 रुपये का जुर्माना भरने की सजा सुनाई गई थी।

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ट्रायल के दौरान, बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि शिकायतकर्ता कमला देवी ने शर्मा के घर से एक खाली चेक चुराकर उसका दुरुपयोग किया और झूठा मुकदमा दायर किया। लिखावट की फॉरेंसिक जांच करवाने और नोटिस का जवाब देने के बावजूद, निचली अदालत ने फैसला शर्मा के खिलाफ सुनाया।

इसके बाद, सुंदरनगर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 28 जुलाई, 2022 को उनकी अपील खारिज कर दी। अंततः, 7 अगस्त को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भी निचली अदालतों के फैसले की पुष्टि कर दी थी, जिसके बाद शर्मा के पास सुप्रीम कोर्ट जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, जो याचिकाकर्ता के लिए न्याय की अंतिम उम्मीद है।

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