सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम मेसर्स राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (आरसीएफ) को बड़ी राहत देते हुए लगभग ₹28.56 करोड़ की एक्साइज ड्यूटी की मांग को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी कच्चे माल को फर्टिलाइजर बनाने के “इरादे” से खरीदा गया है, तो केवल इस आधार पर टैक्स छूट का लाभ नहीं छीना जा सकता कि उसका कुछ हिस्सा तकनीकी मजबूरियों या मिश्रित स्टीम जनरेशन के कारण अन्य कार्यों में उपयोग हो गया।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने 24 मार्च, 2026 को यह फैसला सुनाते हुए राजस्व अधिकारियों और सेस्टेट (CESTAT) के आदेशों के खिलाफ आरसीएफ की अपीलों को स्वीकार कर लिया।
मामले की पृष्ठभूमि
आरसीएफ महाराष्ट्र के थल में फर्टिलाइजर प्लांट संचालित करता है, जहाँ यूरिया और अमोनिया का निर्माण होता है। वर्ष 1996 से 2005 के बीच, कंपनी ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) से ‘शून्य’ दर पर नेफ्था खरीदा था। इसके लिए सरकार द्वारा जारी उन नोटिफिकेशन का लाभ लिया गया था जो फर्टिलाइजर या अमोनिया बनाने के ‘इरादे से उपयोग’ किए जाने वाले नेफ्था को एक्साइज ड्यूटी से छूट देते हैं।
फरवरी 2001 में एक्साइज अधिकारियों ने पाया कि आरसीएफ एक ही बॉयलर में नेफ्था और नेचुरल गैस का उपयोग स्टीम बनाने के लिए कर रहा था। इस स्टीम का अधिकांश हिस्सा फर्टिलाइजर बनाने में जा रहा था, लेकिन कुछ हिस्सा टर्बो जनरेटर के जरिए बिजली बनाने में भी उपयोग हुआ। राजस्व विभाग का आरोप था कि चूंकि नेफ्था का उपयोग “विशेष रूप से” फर्टिलाइजर के लिए नहीं हुआ, इसलिए कंपनी ने छूट का गलत लाभ उठाया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (आरसीएफ) की ओर से: वरिष्ठ वकील श्री बलबीर सिंह ने तर्क दिया कि नेफ्था पूरी तरह से नेक नियत के साथ फर्टिलाइजर बनाने के उद्देश्य से ही खरीदा गया था। उन्होंने कहा कि चूंकि नेफ्था और गैस को एक ही बॉयलर में डाला गया था, इसलिए तकनीकी रूप से यह बताना असंभव था कि कौन सी स्टीम किस ईंधन से बनी है। उन्होंने “रेवेन्यू न्यूट्रालिटी” (Revenue Neutrality) का मुद्दा उठाते हुए कहा कि आरसीएफ एक सरकारी कंपनी है और उसे सब्सिडी मिलती है। यदि वह ड्यूटी चुकाती भी, तो सरकार उसे सब्सिडी के रूप में वापस कर देती, इसलिए टैक्स चोरी का कोई सवाल ही नहीं उठता।
प्रतिवादी (राजस्व विभाग) की ओर से: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल श्री विक्रमजीत बनर्जी ने दलील दी कि आरसीएफ ने नेफ्था के वास्तविक उपयोग को छिपाया। विभाग के अनुसार, छूट केवल तभी मिलनी चाहिए जब नेफ्था का उपयोग सीधे और केवल फर्टिलाइजर या अमोनिया के लिए हो, न कि बिजली या अन्य रसायनों के निर्माण के लिए।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से नोटिफिकेशन में इस्तेमाल किए गए शब्द “इरादतन उपयोग” (Intended for use) की कानूनी व्याख्या पर ध्यान केंद्रित किया। स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया बनाम कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज (1996) मामले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:
“यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि छूट के नोटिफिकेशन में इस बात के प्रमाण की आवश्यकता थी कि कच्चा नेफ्था फर्टिलाइजर के निर्माण में ‘उपयोग के लिए अभिप्रेत’ (intended for use) था, न कि यह कि कच्चे नेफ्थे का वास्तव में फर्टिलाइजर के निर्माण में उपयोग किया गया था। इसकी स्पष्ट भाषा पर जोर दिया जाना चाहिए… और इसके प्रभाव को शून्य नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने सेस्टेट के उस विचार को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि प्राप्तकर्ता को “वास्तविक विशेष उपयोग” साबित करना होगा। कोर्ट ने माना कि यदि कच्चे माल को फर्टिलाइजर बनाने के उद्देश्य से लिया गया है, तो शर्त पूरी मानी जाएगी।
रेवेन्यू न्यूट्रालिटी और समय सीमा पर फैसला
कोर्ट ने यह भी पाया कि विभाग को पांच साल की विस्तारित समय सीमा (Extended Period of Limitation) लागू करने का अधिकार नहीं था। कोर्ट ने कहा कि आरसीएफ एक सरकारी उपक्रम है और यह मामला पूरी तरह “रेवेन्यू न्यूट्रल” है। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“छूट के नोटिफिकेशन के अभाव में उसे जो भी एक्साइज ड्यूटी चुकानी पड़ती, केंद्र सरकार द्वारा सब्सिडी के माध्यम से उसकी प्रतिपूर्ति कर दी जाती। इसलिए, यह रेवेन्यू न्यूट्रालिटी का स्पष्ट मामला है। ऐसे मामले में, जैसा कि इस अदालत ने ‘निर्लोन’ मामले में बताया है, लिमिटेशन की विस्तारित अवधि को लागू करने का प्रश्न ही नहीं उठता।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि टैक्स चोरी की मंशा साबित किए बिना समय सीमा को नहीं बढ़ाया जा सकता।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्व विभाग की अपीलों को स्वीकार करते हुए 27.01.2010 और 04.02.2010 के मूल आदेशों के साथ-साथ 27.03.2012 के सेस्टेट के आदेश को भी रद्द कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरसीएफ मेरिट और लिमिटेशन, दोनों ही आधारों पर सफल रहा है।
केस विवरण
केस का शीर्षक: मेसर्स राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड बनाम कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स (LTU)
केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2219-20 / 2013
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुयान
फैसले की तारीख: 24 मार्च, 2026

