क्या परिभाषा की कमी से उजड़ रहे हैं भारत के वेटलैंड्स? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब; जानें क्या है पूरा विवाद

देश के पर्यावरण और पारिस्थितिकी (ecology) के लिहाज से बेहद संवेदनशील ‘आर्द्रभूमियों’ (Wetlands) की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय आर्द्रभूमि समिति (National Wetlands Committee) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकारी नियमों में वेटलैंड की परिभाषा इतनी अस्पष्ट है कि इसके चलते देश के लगभग आधे संरक्षित क्षेत्रों से सुरक्षा कवच पूरी तरह हट गया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया, “हम अपना नोटिस केवल परिभाषा की अस्पष्टता तक ही सीमित रख रहे हैं।” अदालत ने केंद्र सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए 10 अगस्त तक का समय दिया है।

99 में से 44 संवेदनशील क्षेत्र सुरक्षा से बाहर: याचिका में दावा

यह कानूनी लड़ाई जाने-माने जीवविज्ञानी (biologist) रवींद्र सिन्हा और अन्य पर्यावरणविदों द्वारा दायर एक जनहित याचिका से शुरू हुई है। याचिकाकर्ताओं ने आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है—विशेष रूप से इसके ‘नियम 2(जी)’ (Rule 2(g)) को, जो यह तय करता है कि किस जल क्षेत्र को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और किसे नहीं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि 2017 के नियमों ने वेटलैंड्स को मिलने वाले पुराने कानूनी संरक्षण को बेहद कमजोर कर दिया है। उन्होंने कोर्ट के सामने बेहद चौंकाने वाले आंकड़े रखते हुए कहा कि इस नीतिगत बदलाव के कारण देश के 99 सबसे महत्वपूर्ण संवेदनशील पारिस्थितिकी स्थलों में से 44 स्थल अब सुरक्षा के दायरे से बाहर हो चुके हैं, जिससे उन पर संकट मंडरा रहा है।

नियम 2(जी) में क्या है खामी और किसे नहीं मिल रही सुरक्षा?

मौजूदा नियम 2(जी) के तहत वेटलैंड को दलदल, दलदली भूमि, पीठलैंड (peatland) या पानी के क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है, चाहे वह प्राकृतिक हो या कृत्रिम, स्थायी हो या अस्थायी।

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दिखने में यह परिभाषा सामान्य लगती है, लेकिन याचिका के अनुसार इसकी आड़ में कई महत्वपूर्ण जल प्रणालियों को सुरक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर (exclusionary clause) कर दिया गया है। सुरक्षा से बाहर रखी गई श्रेणियों में शामिल हैं:

  • नदियों के मुख्य चैनल और धान के खेत (paddy fields)
  • पीने के पानी के उद्देश्य से विशेष रूप से बनाए गए कृत्रिम जलाशय या तालाब
  • जलीय कृषि (aquaculture), नमक उत्पादन, मनोरंजन और सिंचाई के लिए तैयार किए गए ढांचे
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पर्यावरणविदों का कहना है कि इन श्रेणियों को बाहर रखने से भूजल को रीचार्ज करने वाले और जैव विविधता को संजोने वाले इन महत्वपूर्ण जल स्रोतों पर व्यावसायिक कब्जे और बर्बादी का खतरा काफी बढ़ गया है।

मौलिक अधिकारों के हनन का आरोप

यह मामला केवल पर्यावरण के नुकसान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़ा संवैधानिक सवाल भी खड़ा करता है। याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि 2017 के नियमों के इस प्रावधान (नियम 2जी) को ‘अधिकारतीत’ (ultra vires – यानी कानून सम्मत अधिकार से बाहर) घोषित किया जाए।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करता है, क्योंकि सुरक्षित पर्यावरण के बिना गरिमापूर्ण जीवन संभव नहीं है।

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अब सबकी नजरें 10 अगस्त पर टिकी हैं, जब केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट को यह समझाना होगा कि देश के सिकुड़ते जल तंत्र और ईको-सिस्टम को बचाने के लिए उसकी बनाई नीतियां कितनी व्यावहारिक और सुरक्षित हैं।

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