NCERT की किताब में अदालती फैसलों की आलोचना पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार; कहा- न्यायपालिका को ‘अति-संवेदनशील’ नहीं होना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शैक्षणिक दृष्टिकोण के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि न्यायपालिका को अपने फैसलों की स्वस्थ आलोचना के प्रति “अति-संवेदनशील” (Oversensitive) नहीं होना चाहिए। कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई जब केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि उसने कक्षा 8 की NCERT पुस्तक की समीक्षा और सामग्री तैयार करने के लिए पूर्व न्यायाधीशों की एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की बेंच पूर्व NCERT सदस्य पंकज पुष्कर द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने पुरानी कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक के एक अंश पर आपत्ति जताई थी, जिसमें लिखा था कि “हाल के फैसले झुग्गीवासियों को शहर में एक अतिक्रमणकारी के रूप में देखते हैं।”

सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार ने न्यायपालिका से संबंधित अध्याय के संशोधन की निगरानी के लिए एक विशेषज्ञ पैनल बनाया है।

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इस समिति में शामिल हैं:

  • के.के. वेणुगोपाल: वरिष्ठ अधिवक्ता और भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल।
  • जस्टिस इंदु मल्होत्रा: सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश।
  • जस्टिस अनिरुद्ध बोस: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और वर्तमान में नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक।
  • एक कुलपति (नाम निर्दिष्ट नहीं)।

सॉलिसिटर जनरल ने बेंच के समक्ष कहा, “हमने अध्याय का मसौदा तैयार करने के लिए समिति का गठन किया है। श्री के.के. वेणुगोपाल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा इस समिति के सदस्य होंगे। हमने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के जस्टिस अनिरुद्ध बोस से भी इसमें शामिल होने का अनुरोध किया है।”

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सुप्रीम कोर्ट ने पाठ्यपुस्तक की सामग्री के खिलाफ याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट का मानना था कि अदालती फैसलों पर अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाने वाली शैक्षणिक सामग्री में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि पाठ्यपुस्तक न्यायपालिका की संरचना और उसकी उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए कानूनी प्रणाली का एक व्यापक दृश्य प्रस्तुत करती है। हालांकि, एक संतुलित शिक्षा के लिए आलोचनात्मक दृष्टिकोण का समावेश भी आवश्यक है।

बेंच ने कहा, “यह एक फैसले के बारे में एक दृष्टिकोण है। यह एक स्वस्थ आलोचना है। न्यायपालिका को इसके बारे में इतना अति-संवेदनशील क्यों होना चाहिए?”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि जहाँ पुस्तक अदालतों द्वारा किए गए अच्छे कार्यों को रेखांकित करती है, वहीं यह कुछ फैसलों के बारे में जनभावना को भी स्वीकार करती है। बेंच ने टिप्पणी की, “वे कहते हैं कि कुछ ऐसे अदालती फैसले भी हैं जिनके बारे में लोगों का मानना है कि वे आम व्यक्तियों के सर्वोत्तम हितों के खिलाफ काम करते हैं। यह एक फैसले के बारे में एक नजरिया है और लोगों को हमारे फैसलों की आलोचना करने का अधिकार है।”

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याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कामकाज पर शैक्षणिक चर्चा को बरकरार रखा गया है। इससे विशेषज्ञ समिति के लिए पाठ्यक्रम की समीक्षा को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।

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