सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: स्पेक्ट्रम आवंटन को आईबीसी के तहत दिवाला कार्यवाही का विषय नहीं बनाया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने देश के इन्सॉल्वेंसी (दिवाला) ढांचे और प्राकृतिक संसाधनों के संप्रभु विनियमन के बीच टकराव को सुलझाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स (TSPs) को आवंटित ‘स्पेक्ट्रम’ को इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (IBC) के तहत कार्यवाही का विषय नहीं बनाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि स्पेक्ट्रम एक प्राकृतिक संसाधन है जिसे सरकार ‘पब्लिक ट्रस्ट’ (सार्वजनिक विश्वास) के तहत अपने पास रखती है। भले ही इसे अकाउंटिंग उद्देश्यों के लिए कंपनी की किताबों में “अमूर्त संपत्ति” (Intangible Asset) के रूप में दर्ज किया जाता हो, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के पास इसका ऐसा मालिकाना हक नहीं होता कि इसे दिवाला समाधान या परिसमापन (Liquidation) का हिस्सा बनाया जा सके।

जस्टिस पमिदीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ (State Bank of India v. Union of India) के नेतृत्व वाली याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने उस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया जिसमें स्पेक्ट्रम को कॉर्पोरेट देनदार (Corporate Debtor) की संपत्ति के रूप में माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या लाइसेंस शुल्क का भुगतान न करने पर जब टेलीकॉम कंपनियां (TSPs) स्वैच्छिक कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया (Voluntary Corporate Insolvency) के लिए IBC का सहारा लेती हैं, तो क्या वे आवंटित स्पेक्ट्रम पर भी ‘मोराटोरियम’ (रोक) का दावा कर सकती हैं? कोर्ट को यह तय करना था कि क्या स्पेक्ट्रम का उपयोग करने का अधिकार IBC की धारा 18 के तहत कॉर्पोरेट देनदार की “संपत्ति” है, या यह विशेष रूप से दूरसंचार कानूनों द्वारा शासित एक संप्रभु संसाधन बना रहता है।

अपने फैसले में, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि “स्पेक्ट्रम के स्वामित्व और नियंत्रण के पुनर्गठन के लिए IBC मार्गदर्शक सिद्धांत नहीं हो सकता।” पीठ ने कहा कि IBC का वैधानिक ढांचा दूरसंचार से संबंधित विशेष कानूनी व्यवस्था में अतिक्रमण नहीं कर सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद एयरसेल समूह की संस्थाओं—एयरसेल लिमिटेड, एयरसेल सेलुलर लिमिटेड और डिशनेट वायरलेस लिमिटेड—की दिवाला कार्यवाही से उत्पन्न हुआ था। इन कंपनियों को दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा यूनिफाइड एक्सेस सर्विस लाइसेंस (UASL) दिए गए थे और उन्होंने नीलामी के माध्यम से विभिन्न बैंडों (900 मेगाहर्ट्ज, 1800 मेगाहर्ट्ज और 2100 मेगाहर्ट्ज) में स्पेक्ट्रम का उपयोग करने का अधिकार प्राप्त किया था।

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जब ये कंपनियां लाइसेंस फीस का भुगतान करने में विफल रहीं और DoT ने वसूली की कोशिश की, तो उन्होंने IBC की धारा 10 के तहत स्वैच्छिक दिवालियापन के लिए आवेदन किया। मार्च 2018 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), मुंबई बेंच ने इन आवेदनों को स्वीकार कर लिया, जिससे सरकार की वसूली प्रक्रिया पर रोक (मोराटोरियम) लग गई। DoT ने इसमें 9,894.13 करोड़ रुपये का दावा प्रस्तुत किया।

इसके बाद, क्रेडिटर्स की समिति (CoC) द्वारा एक रिज़ॉल्यूशन प्लान को मंजूरी दी गई, जिसे NCLT ने भी स्वीकार कर लिया। DoT ने इसे नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी। NCLAT ने अपने आदेश में माना कि हालांकि स्पेक्ट्रम एक प्राकृतिक संसाधन है, लेकिन इसका उपयोग करने का अधिकार टेलीकॉम कंपनी की “अमूर्त संपत्ति” है जो दिवाला कार्यवाही के अधीन है। हालांकि, NCLAT ने यह भी कहा कि स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग के लिए सरकारी बकाया चुकाना अनिवार्य है, जिससे एक विरोधाभास पैदा हुआ। इसके चलते बैंकों (एसबीआई), रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल्स और भारत संघ ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षकारों की दलीलें

टेलीकॉम कंपनियों और वित्तीय संस्थानों की दलीलें: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल्स की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि:

  • टेलीकॉम लाइसेंस और स्पेक्ट्रम का उपयोग करने का अधिकार कॉर्पोरेट देनदार की मूल्यवान “अमूर्त संपत्ति” (Intangible Assets) है।
  • एक बार संपत्ति के रूप में मान्यता मिलने के बाद, यह विशेष रूप से IBC ढांचे के दायरे में आती है।
  • IBC की धारा 238 के तहत, यह कोड किसी भी असंगत कानून या अनुबंध (जैसे लाइसेंस एग्रीमेंट) पर हावी होगा।
  • DoT केवल एक “ऑपरेशनल क्रेडिटर” है और उसके बकाया का निपटान रिज़ॉल्यूशन प्लान के अनुसार किया जाना चाहिए। पुराने बकाया के भुगतान पर स्पेक्ट्रम के उपयोग को शर्त बनाना IBC की धारा 53 के तहत निर्धारित प्राथमिकता क्रम का उल्लंघन है।

भारत संघ (DoT) की दलीलें: अटॉर्नी जनरल ने DoT का पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि:

  • स्पेक्ट्रम एक दुर्लभ और सीमित प्राकृतिक संसाधन है जो भारत के लोगों का है, और सरकार एक ट्रस्टी (पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन) के रूप में कार्य करती है।
  • इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885 की धारा 4 के तहत दिया गया लाइसेंस एक “सीमित, सशर्त और प्रतिसंहरणीय विशेषाधिकार” (Privilege) है, यह लाइसेंसधारक को मालिकाना हक नहीं देता।
  • स्पेक्ट्रम को IBC की धारा 18 के तहत “संपत्ति” नहीं माना जा सकता क्योंकि कॉर्पोरेट देनदार इसका “मालिक” नहीं है।
  • प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जुड़े संप्रभु बकाया को मिटाने या वैधानिक जनादेश को दरकिनार करने के लिए दिवाला कार्यवाही का उपयोग नहीं किया जा सकता।
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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

प्राकृतिक संसाधन के रूप में स्पेक्ट्रम: सुप्रीम कोर्ट ने स्पेक्ट्रम की प्रकृति का विश्लेषण करते हुए 2G मामले और नेचुरल रिसोर्सेज एलोकेशन मामले के सिद्धांतों को दोहराया। पीठ ने कहा कि स्पेक्ट्रम समुदाय का एक “भौतिक संसाधन” है और राज्य इसे जनता के लिए एक ट्रस्टी के रूप में रखता है। कोर्ट ने कहा:

“प्राकृतिक संसाधन लोगों के होते हैं लेकिन राज्य कानूनी रूप से अपनी जनता की ओर से उनका मालिक होता है… राज्य समानता और सार्वजनिक विश्वास (Public Trust) के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।”

लाइसेंस की प्रकृति: स्वामित्व का कोई हस्तांतरण नहीं: कोर्ट ने इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885 की धारा 4 की जांच की, जो केंद्र सरकार को दूरसंचार प्रणाली स्थापित करने का “विशेषाधिकार” देती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि लाइसेंस एक अनुबंध है लेकिन यह संप्रभु शक्ति से निकलता है।

भारती एयरटेल लिमिटेड मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने नोट किया कि लाइसेंस राज्य की ओर से दी गई एक सुविधा (Largesse) है। कोर्ट ने माना कि भले ही टेलीकॉम कंपनियां अकाउंटिंग स्टैंडर्ड 26 (AS 26) के तहत अपनी बैलेंस शीट में स्पेक्ट्रम को “अमूर्त संपत्ति” के रूप में दिखाती हैं, लेकिन यह केवल भविष्य के आर्थिक लाभों पर नियंत्रण को दर्शाता है, यह IBC के लिए आवश्यक कानूनी स्वामित्व प्रदान नहीं करता।

“वित्तीय विवरणों में टेलीकॉम कंपनियों द्वारा स्पेक्ट्रम लाइसेंसिंग अधिकारों को अमूर्त संपत्ति के रूप में मान्यता देना उनके स्वामित्व का निर्णायक सबूत नहीं है… भले ही स्पेक्ट्रम का उपयोग करने का अधिकार संपत्ति जैसी विशेषताओं को प्रदर्शित करता हो… वे पूर्ण स्वामित्व प्रदान करने में विफल रहते हैं।”

IBC की अनुपयुक्तता: सुप्रीम कोर्ट ने IBC की धारा 18(f) और धारा 36(4) की जांच की, और नोट किया कि कोड स्पष्ट रूप से उन संपत्तियों को दिवाला और परिसमापन एस्टेट से बाहर रखता है जो किसी तीसरे पक्ष (Third Party) की हैं लेकिन संविदात्मक व्यवस्था के तहत कॉर्पोरेट देनदार के कब्जे में हैं। चूंकि टेलीकॉम कंपनियों के पास स्पेक्ट्रम का मालिकाना हक नहीं है, इसलिए कोर्ट ने कहा कि इसे IBC के अधीन नहीं किया जा सकता।

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“IBC ढांचे के तहत, स्पेक्ट्रम लाइसेंसिंग अधिकार दिवाला या परिसमापन के लिए संपत्ति के पूल का हिस्सा नहीं है।”

कानूनों का टकराव: IBC और दूरसंचार कानूनों (टेलीग्राफ एक्ट, ट्राई एक्ट) के बीच टकराव को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने ‘सामंजस्यपूर्ण व्याख्या’ (Harmonious Construction) का सिद्धांत लागू किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि केवल अकाउंटिंग ट्रीटमेंट के आधार पर स्पेक्ट्रम पर IBC लागू करना कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण होगा। कोर्ट ने एक मुहावरे का संदर्भ देते हुए कहा कि यह “पूंछ द्वारा कुत्ते को हिलाने” (Tail wagging the dog) जैसा होगा।

“आईबीसी के तहत वैधानिक व्यवस्था को दूरसंचार क्षेत्र में अतिक्रमण करने और स्पेक्ट्रम के प्रशासन, उपयोग और हस्तांतरण से उत्पन्न होने वाले अधिकारों और दायित्वों को फिर से लिखने और पुनर्गठित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने भारत संघ (सिविल अपील संख्या 6546/2021) की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तथा रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल्स द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा:

“(A) हम यह निर्धारित करते हैं कि टेलीकॉम कंपनियों (TSPs) को आवंटित स्पेक्ट्रम, जिसे उनके खातों की किताबों में ‘संपत्ति’ के रूप में दिखाया गया है, को इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 के तहत कार्यवाही का विषय नहीं बनाया जा सकता है।”

यह फैसला निर्णायक रूप से स्थापित करता है कि वाणिज्यिक दिवाला ढांचा सार्वजनिक विश्वास में रखे गए प्राकृतिक संसाधनों को नियंत्रित और विनियमित करने के संप्रभु अधिकार पर हावी नहीं हो सकता।

केस डीटेल्स:

  • केस का नाम: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ व अन्य (और संबद्ध मामले)
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 1810/2021
  • कोरम: जस्टिस पमिदीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर

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