सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी लेनदार का काउंटर-क्लेम (counterclaim) मंजूरशुदा रेजोल्यूशन प्लान का हिस्सा नहीं है, तो वह समाप्त माना जाएगा, लेकिन लेनदार अभी भी लंबित मध्यस्थता (arbitration) कार्यवाही में इसका उपयोग ‘सेट-ऑफ’ (set-off) के बचाव के तौर पर कर सकता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के एक फैसले में संशोधन करते हुए यह निर्णय लिया। कोर्ट ने इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत और प्रतिवादी के बकाया राशि के समायोजन के न्यायसंगत अधिकार के बीच संतुलन कायम किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद साल 2017 में उजास एनर्जी लिमिटेड (अपीलकर्ता) और पश्चिम बंगाल पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (प्रतिवादी) के बीच सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना के अनुबंध से शुरू हुआ था।
सितंबर 2020 में, उजास एनर्जी के खिलाफ कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू हुई। इस दौरान, अपीलकर्ता ने रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) के माध्यम से दिसंबर 2021 में प्रतिवादी के खिलाफ मध्यस्थता शुरू की। जवाब में प्रतिवादी ने अपना बचाव और काउंटर-क्लेम दाखिल किया, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह रही कि प्रतिवादी ने CIRP के दौरान RP के पास अपना दावा पेश नहीं किया था।
13 अक्टूबर, 2023 को NCLT, इंदौर ने अपीलकर्ता के लिए एक रेजोल्यूशन प्लान को मंजूरी दे दी। इसके बाद, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि चूंकि काउंटर-क्लेम प्लान का हिस्सा नहीं था, इसलिए IBC की धारा 31 के तहत यह खत्म हो गया है। आर्बिटल ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए एक अंतरिम आदेश के जरिए काउंटर-क्लेम को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट के सिंगल जज ने ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन डिवीजन बेंच ने इसे पलट दिया और ट्रिब्यूनल को दावे और काउंटर-क्लेम दोनों पर कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया। इसके खिलाफ कॉर्पोरेट देनदार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अभिजीत सिन्हा ने तर्क दिया कि निर्धारित समय के भीतर RP के समक्ष दावा पेश न करने के कारण प्रतिवादी अब इसे उठाने का हकदार नहीं है। उन्होंने ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि रेजोल्यूशन प्लान की मंजूरी के बाद उन सभी दावों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है जो इसका हिस्सा नहीं थे।
दूसरी ओर, प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जिष्णु चौधरी ने दलील दी कि भले ही प्रतिवादी कोई नई वसूली या भुगतान की मांग न करे, लेकिन उसे ‘सेट-ऑफ’ के रूप में दावे का उपयोग करने की अनुमति मिलनी चाहिए ताकि अपीलकर्ता को होने वाले किसी भी संभावित भुगतान में इसे समायोजित किया जा सके।
कोर्ट का विश्लेषण
कोर्ट ने सबसे पहले IBC की धारा 31(1) के तहत रेजोल्यूशन प्लान की बाध्यकारी प्रकृति की पुष्टि की। घनश्याम मिश्रा एंड संस (पी) लिमिटेड बनाम एडलवाइस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“अधिकारी द्वारा रेजोल्यूशन प्लान को मंजूरी दिए जाने की तिथि पर, वे सभी दावे जो प्लान का हिस्सा नहीं हैं, समाप्त हो जाएंगे और कोई भी व्यक्ति उस दावे के संबंध में कार्यवाही शुरू करने या जारी रखने का हकदार नहीं होगा, जो रेजोल्यूशन प्लान का हिस्सा नहीं है।”
तदनुसार, कोर्ट ने माना कि प्रतिवादी किसी स्वतंत्र राहत की मांग नहीं कर सकता क्योंकि काउंटर-क्लेम मंजूरशुदा योजना में शामिल नहीं था।
हालांकि, पीठ ने रेजोल्यूशन प्लान के पैराग्राफ 12.4.1 की भाषा का बारीकी से अध्ययन किया, जो दावों के संबंध में “भुगतान या निपटान” को रोकता था। कोर्ट ने पाया कि यह प्लान स्पष्ट रूप से ‘सेट-ऑफ’ के बचाव को नहीं रोकता है। कोर्ट ने माना कि चूंकि केवल “भुगतान या निपटान” वर्जित था, इसलिए बचाव के रूप में इसका उपयोग कानूनी रूप से संभव है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारती एयरटेल लिमिटेड बनाम एयरसेल लिमिटेड का फैसला यहां सीधे लागू नहीं होता क्योंकि वह मामला CIRP के दौरान सेट-ऑफ से संबंधित था, जबकि वर्तमान मामला एक बाध्यकारी रेजोल्यूशन प्लान के संदर्भ में है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया और हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के आदेश में संशोधन किया। कोर्ट ने कहा:
“प्रतिवादी, हालांकि रेजोल्यूशन प्लान की मंजूरी के बाद काउंटर-क्लेम के जरिए स्वतंत्र रूप से अपने दावे को आगे बढ़ाने का हकदार नहीं है, लेकिन उसे कम से कम बचाव (defence) के तौर पर ‘सेट-ऑफ’ की दलील देने की अनुमति दी जानी चाहिए।”
कोर्ट ने निम्नलिखित शर्तें भी स्पष्ट कीं:
- प्रतिवादी इस बचाव के आधार पर कोई सकारात्मक राहत प्राप्त नहीं कर सकेगा; इसका उपयोग केवल अपीलकर्ता के दावे को रोकने के लिए किया जा सकता है।
- यदि काउंटर-क्लेम की राशि अपीलकर्ता को मिलने वाली राशि से अधिक निकलती है, तो प्रतिवादी उस अतिरिक्त राशि की वसूली नहीं कर पाएगा।
- यदि अपीलकर्ता अपनी मध्यस्थता कार्यवाही वापस ले लेता है, तो प्रतिवादी का काउंटर-क्लेम भी स्वतः विफल हो जाएगा।
केस विवरण ब्लॉक
- केस का शीर्षक: उजास एनर्जी लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ ऑफ 2026 (SLP (सिविल) संख्या 29651 ऑफ 2024 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
- फैसले की तिथि: 20 मार्च 2026

