जीपीए को रद्द न करना और 10 साल की लंबी चुप्पी धोखाधड़ी के आरोपों को करती है कमजोर: सुप्रीम कोर्ट का संपत्ति विवाद में महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती देने वाली दीवानी अपील को खारिज कर दिया है। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में प्रथम अपीलीय अदालत के उस निर्णय की पुष्टि की थी, जिसने ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) द्वारा डिक्री किए गए संपत्ति विवाद के मुकदमे को उलट दिया था।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने इस मामले में कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा की। इनमें मुख्य रूप से सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश XLI नियम 31 के तहत अपीलीय निर्णयों की प्रक्रियात्मक अनिवार्यताएं, धोखाधड़ी के मामलों में सबूतों के हस्तांतरण (shifting of burden of proof) की शर्तें, गवाह के रूप में मुख्य पक्षकार के पेश न होने पर प्रतिकूल निष्कर्ष (adverse inference) निकालने का नियम, और लंबे समय से बिना किसी चुनौती के चले आ रहे राजस्व (दाखिल-खारिज) रिकॉर्ड्स की कानूनी प्रासंगिकता शामिल हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद कोयम्बटूर तालुक के कालापट्टी गांव में स्थित कृषि भूमि के दो टुकड़ों से जुड़ा है, जिसे अपीलकर्ता मल्लिका ने साल 1996 में पंजीकृत सेल डीड (बिक्री विलेख) के माध्यम से खरीदा था:

  • मद संख्या 1: पुंजा एकड़ 1.66 (दस्तावेज संख्या 6369/1996, प्रदर्श ए1/बी2)
  • मद संख्या 2: पुंजा एकड़ 0.37½ (दस्तावेज संख्या 6370/1996, प्रदर्श ए2/बी3)

अपीलकर्ता ने इस कुल 2.032 एकड़ कृषि भूमि पर अपने पूर्ण स्वामित्व का दावा किया था।

अपीलकर्ता के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1997 और 1998 में प्रतिवादी संख्या 1 और 2 (जो सगे भाई हैं) के पक्ष में दो जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) निष्पादित किए थे। मल्लिका का दावा था कि ये जीपीए (दस्तावेज संख्या 416/1997 और 465/1998) केवल ₹2 लाख और ₹5 लाख के ऋण (लोन) के बदले गारंटी के तौर पर लिखे गए थे, जिस पर 18% वार्षिक ब्याज तय था। उन्होंने कहा कि मूल मालिकाना दस्तावेज भी केवल सुरक्षा (कोलेटरल) के रूप में सौंपे गए थे।

अपीलकर्ता का आरोप था कि प्रतिवादी भाइयों ने इन जीपीए का दुरुपयोग किया और उनके आधार पर अपने ही करीबी रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों के नाम दो सेल डीड निष्पादित कर दीं। हालांकि इस सौदे की एवज में कथित तौर पर भुगतान की रसीदें (प्रदर्श बी7 और बी9) प्रस्तुत की गईं, लेकिन अपीलकर्ता का तर्क था कि इन रसीदों में न तो भुगतान की गई राशि का स्पष्ट जिक्र था और न ही किसी गवाह के जरिए इन्हें प्रमाणित किया गया था। बाद में इन संपत्तियों को परिवार के भीतर और फिर तीसरे पक्षों को बार-बार ट्रांसफर किया गया।

मल्लिका का कहना था कि उन्होंने ब्याज सहित सारा कर्ज चुका दिया था, लेकिन प्रतिवादियों ने न तो जीपीए रद्द किए और न ही मूल दस्तावेज लौटाए। अपीलकर्ता के अनुसार, उन्हें इस धोखाधड़ी का पता साल 2008 में सब-रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकॉर्ड की जांच के बाद चला। इसके बाद, अगस्त 2008 में मल्लिका ने कोयम्बटूर की सबऑर्डिनेट कोर्ट में मूल मुकदमा (ओ.एस. संख्या 472/2008) दायर किया, जिसमें उन्होंने जीपीए के जरिए निष्पादित सेल डीड्स को शून्य घोषित करने और संपत्ति पर अपने कब्जे को बनाए रखने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा (इंजेक्शन) की मांग की।

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निचली अदालतों के निष्कर्ष

  • ट्रायल कोर्ट (निर्णय दिनांक 22.03.2012): ट्रायल कोर्ट ने मल्लिका के पक्ष में फैसला सुनाते हुए जीपीए को केवल ऋण सुरक्षा दस्तावेज माना और प्रतिवादियों द्वारा पेश रसीदों (बी7 और बी9) को संदेहास्पद पाते हुए सभी पांचों सेल डीड्स को शून्य घोषित कर दिया।
  • प्रथम अपीलीय अदालत (निर्णय दिनांक 08.03.2016): चतुर्थ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, कोयम्बटूर ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह पलट दिया। अपीलीय अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का बोझ गलत तरीके से प्रतिवादियों पर डाल दिया था। अपीलकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहीं कि उन्होंने ऋण चुका दिया है या संपत्ति पर उनका निरंतर कब्जा बना हुआ है। इसके अलावा, प्रतिवादियों और खरीदारों के नाम पर दर्ज दाखिल-खारिज और राजस्व रिकॉर्ड को कब्जे का ठोस आधार माना गया।
  • मद्रास हाईकोर्ट (निर्णय दिनांक 03.01.2017): हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की दूसरी अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसमें कानून का कोई गंभीर या सारवान प्रश्न (substantial question of law) शामिल नहीं है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि अपीलकर्ता स्वयं गवाह के रूप में पेश नहीं हुईं, ऋण चुकाने का कोई सबूत नहीं दिया और लंबे समय तक म्यूटेशन व पंजीकृत दस्तावेजों के अस्तित्व में रहने के बाद बहुत देर से अदालत का दरवाजा खटखटाया।

इस फैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा अपील दायर की।

पक्षों के कानूनी तर्क

अपीलकर्ता की ओर से दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील श्री सिवाज्ञानम कार्तिकेयन ने हाईकोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसलों का कड़ा विरोध किया:

  1. सीपीसी के आदेश XLI नियम 31 का उल्लंघन: अपीलीय अदालत ने कानून की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया। विवाद के वास्तविक बिंदुओं को तय करने के बजाय, कोर्ट ने केवल मुकदमे में मांगी गई राहतों को ही दोहरा दिया। इसके लिए उन्होंने एच. सिद्दीकी (मृतक) कानूनन प्रतिनिधि बनाम ए. रामालिंगम मामले का हवाला दिया।
  2. विश्वासघात और छद्म लेनदेन: जीपीए केवल सुरक्षा के रूप में दिए गए थे क्योंकि प्रतिवादी पेशेवर साहूकार थे जो अक्सर खाली कागजों और जीपीए पर दस्तखत ले लेते थे। चूंकि जीपीए धारक एक विश्वासपात्र (fiduciary) की स्थिति में थे, इसलिए सौदे की निष्पक्षता साबित करने की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं की थी। उन्होंने सुभ्रा मुखर्जी बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड मामले पर भरोसा जताया।
  3. कमजोर रसीदें: प्रदर्श बी7 और बी9 संदेहास्पद थीं क्योंकि उनमें भुगतान की राशि का ब्यौरा नहीं था और गवाहों से उन्हें साबित नहीं कराया गया था।
  4. गवाही से बचने पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं: अपीलकर्ता का स्वयं गवाह के रूप में न आना घातक नहीं है, क्योंकि उनके पति (PW-1) और पड़ोसी (PW-2) ने गवाही देकर कब्जे और परिस्थितियों की संदिग्धता को साबित कर दिया था।
  5. राजस्व प्रविष्टियों की सीमाएं: पट्टा, चिट्टा और अडंगल जैसे राजस्व दस्तावेज केवल वित्तीय कर (fiscal) उद्देश्यों के लिए होते हैं, इनसे मालिकाना हक या कब्जा साबित नहीं होता।
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प्रतिवादियों की ओर से दलीलें

प्रतिवादियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं श्री वी. चिदंबरेश और श्री जयंत मुथु राज ने इन तर्कों का पुरजोर खंडन किया:

  1. तथ्यात्मक विवाद: यह पूरी तरह से तथ्यों का मामला है, जिसमें प्रथम अपीलीय अदालत अंतिम अदालत होती है। हाईकोर्ट ने सही पाया कि मामले में कानून का कोई सारवान प्रश्न नहीं उठता।
  2. प्रक्रियात्मक अनुपालन: प्रथम अपीलीय अदालत ने अपने निर्णय के पैराग्राफ 7 में विचारणीय बिंदुओं को स्पष्ट किया था और साक्ष्यों का बिंदुवार विश्लेषण किया था, जो आदेश XLI नियम 31 का पर्याप्त अनुपालन है।
  3. कर्ज चुकाने का कोई प्रमाण नहीं: अपीलकर्ता ने ऋण लेने, उसका ब्याज चुकाने या मूलधन वापस करने का कोई भी दस्तावेजी प्रमाण कोर्ट में पेश नहीं किया।
  4. प्रतिकूल निष्कर्ष अनिवार्य: अपीलकर्ता ने धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए लेकिन स्वयं गवाह के रूप में जिरह के लिए उपलब्ध नहीं हुईं। विद्याधर बनाम मणिकराव मामले के तहत, जब मुख्य पक्षकार खुद गवाही से बचता है, तो उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना बिल्कुल उचित है।
  5. हदबंदी और अत्यधिक देरी: विवादित लेनदेन 1998 में हुए, जबकि मुकदमा 2008 में यानी लगभग 10 साल बाद दर्ज किया गया। तीन साल की कानूनी समय सीमा (limitation period) बीत जाने के कारण यह मुकदमा पूरी तरह से कालबाधित (barred by limitation) था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए प्रत्येक कानूनी पहलू का बारीकी से अध्ययन किया:

1. सीपीसी के आदेश XLI नियम 31 का अनुपालन

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि प्रथम अपीलीय अदालत को सभी साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन करना चाहिए और एच. सिद्दीकी मामले के तहत नियमों का पालन जरूरी है, फिर भी इसमें केवल तकनीकी औपचारिकता के बजाय व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए:

“हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सीपीसी के आदेश XLI नियम 31 की आवश्यकता वास्तविक अनुपालन (substantial compliance) की है, न कि केवल एक तकनीकी औपचारिकता की। निर्णय का सार और जिस तरह से अपीलीय अदालत ने विवाद को निपटाया है, वह उन बिंदुओं को तैयार करने के प्रारूप की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।”

अदालत ने पाया कि चूंकि प्रथम अपीलीय अदालत ने ऋण लेनदेन, भुगतान रसीदें, कब्जा, दाखिल-खारिज और समय सीमा जैसे सभी पहलुओं पर गहराई से विचार किया था, इसलिए केवल इस प्रक्रियात्मक आधार पर अपीलीय निर्णय को रद्द नहीं किया जा सकता।

2. सबूतों का बोझ और विश्वासघात के आरोप

विश्वासपात्र की भूमिका और सबूतों के स्थानांतरण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह साबित करने का भार कि लेनदेन वास्तविक बिक्री नहीं थे बल्कि केवल ऋण के लिए सुरक्षा व्यवस्था थे, पूरी तरह अपीलकर्ता पर था। धोखाधड़ी या विश्वासघात के केवल आरोप ही पर्याप्त नहीं हैं जब तक कि उनके समर्थन में विश्वसनीय और ठोस सबूत न हों।”

न्यायालय ने सुभ्रा मुखर्जी मामले का संदर्भ देते हुए आगे जोड़ा कि:

“प्रतिवादियों पर बोझ स्थानांतरित होने से पहले, अपीलकर्ता को पहले धोखाधड़ी या विश्वासघात के बुनियादी तथ्यों को स्थापित करना आवश्यक था।”

चूंकि मल्लिका ऋण अदायगी या लेनदेन से जुड़े किसी भी प्राथमिक तथ्य को साबित नहीं कर सकीं, इसलिए सबूतों का प्रारंभिक भार प्रतिवादियों पर नहीं डाला जा सकता था।

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3. अपीलकर्ता का कोर्ट में पेश न होना और प्रतिकूल निष्कर्ष का सिद्धांत

मुकदमे के दौरान मुख्य अपीलकर्ता का खुद को गवाही के दायरे से बाहर रखना उनके मामले के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ। कोर्ट ने विद्याधर बनाम मणिकराव मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की:

“जहां तथ्यों का विशेष ज्ञान रखने वाला कोई पक्ष गवाह के रूप में अदालत के सामने नहीं आता है, वहां उस पक्ष के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है।”

खंडपीठ ने कहा कि चूंकि अपीलकर्ता और उनके पति दोनों ही रियल एस्टेट के कारोबार से जुड़े थे और वे अनपढ़ नहीं थे, ऐसे में धोखाधड़ी के इतने गंभीर आरोप लगाने के बावजूद मल्लिका का स्वयं गवाह के रूप में पेश न होना उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष को पूरी तरह सही ठहराता है।

4. दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) प्रविष्टियों का महत्व और 10 साल की देरी

अपीलकर्ता की ओर से लगभग 10 वर्षों की लंबी निष्क्रियता और इस दौरान राजस्व रिकॉर्ड्स में दर्ज प्रतिवादियों के नामों को कोर्ट ने एक निर्णायक परिस्थिति माना। कोर्ट ने कहा:

“हम इस बात से अवगत हैं कि केवल म्यूटेशन प्रविष्टियां ही स्वामित्व अधिकार नहीं बनाती या हस्तांतरित नहीं करती हैं। हालांकि, जब ऐसे राजस्व रिकॉर्ड कई वर्षों तक जारी रहते हैं, पंजीकृत बिक्री लेनदेन द्वारा समर्थित होते हैं और एक लंबी अवधि (वर्तमान मामले में एक दशक) तक उन्हें चुनौती नहीं दी जाती है, तो वे कब्जे और पक्षों के आचरण पर विचार करते समय प्रासंगिक कारक बन जाते हैं।”

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि 1998 से 2008 के बीच मल्लिका ने न तो अपने जीपीए रद्द कराए, न ही म्यूटेशन पर कोई आपत्ति जताई और न ही किसी सक्षम प्राधिकारी के पास शिकायत की। यह आचरण उस व्यक्ति के सामान्य व्यवहार से बिल्कुल अलग है जो यह दावा करता है कि उसकी संपत्ति को धोखे से बेच दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रथम अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट के फैसलों में कोई भी कानूनी त्रुटि, प्रक्रियात्मक अवैधता या अधिकार क्षेत्र संबंधी चूक नहीं थी। साक्ष्यों के विश्लेषण और कानून के सिद्धांतों के आधार पर मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय को पूरी तरह सही पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की दीवानी अपील को खारिज कर दिया। मामले से जुड़े सभी लंबित आवेदन भी समाप्त घोषित कर दिए गए।

मामले के विवरण

  • मामले का शीर्षक: मल्लिका बनाम आर. नल्लाथम्बी और अन्य
  • सिविल अपील संख्या: 2017 की सिविल अपील संख्या 9837
  • पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
  • दिनांक: 22 मई, 2026

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