सुप्रीम कोर्ट ने केवल 65 दिन साथ रहने और एक दशक से अधिक समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले जोड़े की शादी खत्म की; अदालतों को ‘युद्ध का मैदान’ बनाने पर जुर्माना लगाया

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक ऐसे जोड़े की शादी को भंग कर दिया है, जो शादी के बाद केवल 65 दिनों तक साथ रहे, लेकिन एक-दूसरे के खिलाफ 40 से अधिक मुकदमे दर्ज कराकर पिछले एक दशक से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने स्पष्ट किया कि “लड़ने वाले जोड़ों को अदालतों को अपने युद्ध के मैदान (Battlefield) के रूप में इस्तेमाल करने और न्यायिक प्रणाली को बाधित (Choke) करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” कोर्ट ने ‘शादी के पूरी तरह टूटने’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक को मंजूरी दी। हालांकि, तलाक देते समय कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पार्टियों के खिलाफ शुरू की गई ‘परज्यूरी’ (झूठी गवाही) की कार्यवाही जारी रहेगी, क्योंकि “किसी को भी न्याय की धारा को दूषित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

विवाद की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता (पत्नी) और प्रतिवादी (पति) का विवाह 28 जनवरी, 2012 को हुआ था। हालांकि, यह रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चल सका और शादी के महज 65 दिन बाद, 2 अप्रैल, 2012 को दोनों अलग हो गए। अलग होने के बाद, दोनों पक्षों के बीच मुकदमेबाजी का एक लंबा दौर शुरू हो गया। दोनों ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और सुप्रीम कोर्ट सहित विभिन्न अदालतों में एक-दूसरे के खिलाफ कई आपराधिक और दीवानी मामले दर्ज कराए।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट तब पहुंचा जब पत्नी ने एक ट्रांसफर पिटीशन दायर की। इसमें उसने पति द्वारा दायर सीआरपीसी (CrPC) की धारा 340 के तहत एक आवेदन को दिल्ली की फैमिली कोर्ट से लखनऊ ट्रांसफर करने की मांग की थी। कार्यवाही के दौरान, पत्नी ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत एक इंटरलोक्यूटरी एप्लिकेशन (I.A.) दायर कर शादी को खत्म करने की गुहार लगाई।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता-पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि शादी पूरी तरह से टूट चुकी है और सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है। यह बताया गया कि दोनों पक्ष एक दशक से अधिक समय से अलग रह रहे हैं और लगातार मुकदमेबाजी में उलझे हुए हैं। शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (2023) मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग कर विवाह को भंग कर सकता है।

दूसरी ओर, प्रतिवादी-पति ने व्यक्तिगत रूप से (in-person) पेश होकर तलाक की प्रार्थना का कड़ा विरोध किया। उसने कहा कि पत्नी द्वारा दायर “झूठे और तुच्छ मुकदमों के कारण उसका पूरा जीवन बर्बाद हो गया है।” उसने आरोप लगाया कि पत्नी ने झूठी गवाही (perjury) दी है, जिसके लिए उसने सीआरपीसी की धारा 340 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 379 के तहत आवेदन दायर किए हैं, जो लंबित हैं। पति ने यह भी तर्क दिया कि पत्नी अच्छी तरह से स्थापित है और लगभग 1,60,000 रुपये प्रति माह कमा रही है और अपने पैसे का इस्तेमाल उसे परेशान करने के लिए कर रही है, जबकि वह बेरोजगार है और खुद अपने केस लड़ रहा है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

कोर्ट ने नोट किया कि 22 जुलाई, 2025 को मध्यस्थता (Mediation) के लिए मामला भेजे जाने सहित सुलह के तमाम प्रयासों के बावजूद कोई समाधान नहीं निकल सका। पीठ ने पाया कि पार्टियों ने एक-दूसरे के खिलाफ 40 से अधिक मामले दर्ज कराए हैं।

शादी के पूरी तरह टूटने पर: संविधान पीठ के शिल्पा शैलेश मामले के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए शादी के पूरी तरह टूट जाने के आधार पर उसे भंग करने का विवेकाधिकार उसके पास है, भले ही एक पक्ष इसका विरोध कर रहा हो। पीठ ने कहा:

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“ऊपर बताए गए मामले के तथ्यों से, हम पाते हैं कि यह शादी के पूरी तरह टूटने (irretrievable breakdown) का एक स्पष्ट मामला है, जहां पक्ष साथ रहने और जीवन बिताने का इरादा नहीं रखते… वे शायद एक-दूसरे के लिए बने ही नहीं थे… अब घड़ी की सुई को वापस घुमाना और पिछले एक दशक से अधिक समय में पैदा हुई कड़वाहट को भुलाकर साथ रहना असंभव हो सकता है।”

कानूनी प्रणाली के दुरुपयोग पर: मुकदमों की बाढ़ को देखते हुए कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और कहा:

“उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ 40 से अधिक मामले दर्ज कराए हैं। लड़ने वाले जोड़ों को अपना हिसाब बराबर करने के लिए अदालतों को युद्ध के मैदान के रूप में इस्तेमाल करने और सिस्टम को चोक (Choke) करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

वैवाहिक विवादों के आपराधिक मामलों में बदलने की प्रवृत्ति पर पीठ ने टिप्पणी की:

“सबसे पहले, पार्टियों द्वारा ईमानदारी से प्रयास किया जाना चाहिए… कि वे मुकदमे से पहले मध्यस्थता (pre-litigation mediation) के लिए राजी हों… यहां तक कि जब साधारण वैवाहिक विवाद की शिकायत पुलिस में दर्ज कराने की कोशिश की जाती है, तो सबसे पहला प्रयास सुलह का होना चाहिए… न कि पार्टियों को पुलिस स्टेशनों में बुलाने का।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत आवेदन को स्वीकार किया और पार्टियों के बीच विवाह को भंग कर दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. विवाह विच्छेद: विवाह को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाता है।
  2. मुकदमों का निपटारा: पार्टियों के बीच लंबित सभी वैवाहिक और आपराधिक मामले जो इस विवाद से उत्पन्न हुए हैं, उन्हें निस्तारित (disposed of) माना जाएगा।
  3. परज्यूरी की कार्यवाही जारी रहेगी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 340 या बीएनएसएस की धारा 379 के तहत झूठी गवाही (perjury) को लेकर दायर किए गए आवेदन जारी रहेंगे क्योंकि “किसी को भी न्याय की धारा को दूषित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” फैसले में विशेष रूप से ऐसे पांच आवेदनों को सूचीबद्ध किया गया है जिन पर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई होगी।
  4. जुर्माना (Costs): यह देखते हुए कि पक्ष केवल 65 दिनों के लिए साथ रहे लेकिन “अपना हिसाब बराबर करने के उद्देश्य से” एक दशक से अधिक समय तक मुकदमेबाजी की, कोर्ट ने प्रत्येक पक्ष पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन के पास जमा करना होगा।
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केस विवरण:

  • केस टाइटल: नेहा लाल बनाम अभिषेक कुमार
  • केस नंबर: ट्रांसफर पिटीशन (क्रिमिनल) संख्या 338 ऑफ 2025 (I.A. संख्या 200539 ऑफ 2025 के साथ)
  • कोरम: जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन

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