भारत के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने उड़ीसा हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए यह निर्धारित किया है कि 99 साल की पंजीकृत लीज डीड (registered lease deed) का एकतरफा रद्दीकरण पूरी तरह से अवैध है। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब किसी दस्तावेज़ के स्पष्ट और शाब्दिक अर्थ से संपत्ति में अधिकार (interest in property) का हस्तांतरण साबित होता है, तो वह समझौता महज़ एक लाइसेंस (licence) न होकर एक लीज़ (lease) माना जाएगा। यह सिद्धांत तब भी लागू होगा जब संपत्ति का मूल मालिक उस संपत्ति के किसी ऐसे हिस्से पर अपना कब्ज़ा बनाए रखता है, जो लीज़ का हिस्सा नहीं है।
अदालत ने वादी संस्था, विवेकानंद केंद्र (Vivekananda Kendra) के पक्ष में ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत की समवर्ती डिक्री को बहाल कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद बारीपदा शहर में स्थित एक संपत्ति से जुड़ा है, जिसका मूल स्वामित्व स्वर्गीय अनिमा बोस के पास था। 23 मार्च 1998 को, अनिमा बोस ने विवेकानंद केंद्र के पक्ष में 99 वर्ष की एक पंजीकृत “लीज डीड” निष्पादित की। इस डीड के तहत एक शाखा केंद्र स्थापित करने और संस्था के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए संपत्ति को 1,000 रुपये के वार्षिक किराये पर लीज़ पर दिया गया था। हालांकि, समझौते के अनुसार बोस ने संपत्ति की पहली मंजिल पर अपना कब्ज़ा बनाए रखा था।
करीब पांच साल बाद, 3 दिसंबर 2003 को, बोस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए लीज़ का रद्दीकरण डीड (Deed of Cancellation) निष्पादित कर दिया और संपत्ति खाली करने का नोटिस जारी कर दिया। केंद्र ने इसका कड़ा विरोध करते हुए 99 साल तक अपने अधिकार का दावा किया।
मई 2005 में बोस ने सुजीत कुमार मोहंती के पक्ष में पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की। इसके बाद केंद्र ने आरोप लगाया कि उसके कब्ज़े में बलपूर्वक बाधा डाली गई। जनवरी 2006 में विवादित संपत्ति एक पंजीकृत सेल डीड (sale deed) के जरिए प्रदीप कुमार अग्रवाल और रतनदीप अग्रवाल (प्रतिवादी संख्या 3 और 4) को बेच दी गई। इसके खिलाफ विवेकानंद केंद्र ने अपने लीज़होल्ड अधिकारों की घोषणा, कब्ज़े की वसूली और स्थायी निषेधाज्ञा (permanent injunction) की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।
ट्रायल कोर्ट ने 2018 में केंद्र के पक्ष में फैसला सुनाते हुए एकतरफा रद्दीकरण को अवैध व शून्य घोषित किया। 2021 में प्रथम अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को सही ठहराया। लेकिन, उड़ीसा हाईकोर्ट ने इन निष्कर्षों को पलट दिया और माना कि दस्तावेज़ केवल एक केंद्र चलाने का लाइसेंस था, न कि लीज़, और इस आधार पर मुकदमा खारिज कर दिया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (विवेकानंद केंद्र): वकील रुत्विक पांडा ने दलील दी कि डीड का स्पष्ट और शाब्दिक अर्थ पूरी तरह से इसे एक लीज़ (lease simpliciter) साबित करता है। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि दस्तावेज़ को एक लाइसेंस के रूप में व्याख्यायित करना कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि एक पंजीकृत लीज़ डीड, जिससे पट्टेदार (lessee) को पहले ही वैधानिक अधिकार मिल चुके हों, उसका एकतरफा रद्दीकरण पूरी तरह गैरकानूनी है।
प्रतिवादी (खरीददार): वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पाणिग्रही ने दलील दी कि दस्तावेज़ का नामकरण (nomenclature) ही एकमात्र निर्णायक कारक नहीं होता। उनका तर्क था कि चूंकि बोस ने पहली मंजिल पर अपना कब्ज़ा बनाए रखा था, इसलिए उन्होंने परिसर का पूर्ण कब्ज़ा और नियंत्रण सौंपे बिना वादी को केवल एक केंद्र स्थापित करने की अनुमति दी थी, जिससे यह लेनदेन महज़ एक लाइसेंस बन जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने लीज़ और लाइसेंस के बीच कानूनी अंतर की विस्तार से जांच की। अदालत ने Associated Hotels of India Ltd. v. R.N. Kapoor और Mrs M.N Clubwala and another v. Fida Hussain Saheb and others जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि कोई दस्तावेज़ संपत्ति में कोई हित (interest) पैदा करता है, तो वह एक लीज़ है; लेकिन यदि वह किसी अन्य व्यक्ति को केवल संपत्ति का उपयोग करने की अनुमति देता है जबकि कानूनी कब्ज़ा मालिक के पास ही रहता है, तो उसे लाइसेंस माना जाएगा।
Annaya Kocha Shetty v. Laxmi Narayan Satose मामले का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने “निर्माण के शाब्दिक नियम” (literal rule of construction) पर जोर दिया और कहा कि किसी भी अनुबंध में पक्षों की मंशा सबसे पहले दस्तावेज़ के स्पष्ट और सामान्य अर्थ से खोजी जानी चाहिए।
डीड के खंडों का विश्लेषण करते हुए, कोर्ट ने “The Lessor hereby demises to the Lessee” जैसे स्पष्ट वाक्यांशों, 99 वर्ष की लंबी अवधि और 1,000/- रुपये के निर्धारित वार्षिक किराये का प्रमुखता से संज्ञान लिया। कोर्ट ने अपनी अहम टिप्पणी में कहा:
“जब पाठ के स्पष्ट और सामान्य अर्थ से मंशा समझ में आ जाती है, तो उद्देश्यपूर्ण निर्माण (purposive construction) या पूर्व-प्रभावित (ex-post facto) परिस्थितियों के माध्यम से मंशा की व्याख्या करना अनावश्यक है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि दस्तावेज़ का केवल नामकरण दस्तावेज़ की प्रकृति का निर्णायक कारक नहीं है; यह पाठ और संदर्भ है जो किसी लिखित दस्तावेज़ में पक्षों द्वारा लिए गए दायित्वों की ओर इशारा करता है।”
हाईकोर्ट के उस तर्क को सख्ती से खारिज करते हुए कि पहली मंजिल पर मकान मालिक के निरंतर कब्ज़े का मतलब लाइसेंस है, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“विशेष कब्ज़े का आकलन पट्टे पर दिए गए (demised) हिस्से के संबंध में किया जाता है, न कि उस हिस्से के संबंध में जिसे अनुबंध (Ext. 1) के दायरे से बाहर रखा गया है।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
यह निष्कर्ष निकालते हुए कि दस्तावेज़ निर्विवाद रूप से 99 साल की लीज़ डीड थी, सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि इसका एकतरफा रद्दीकरण पूरी तरह अवैध था। अदालत ने अपने फैसले में कहा:
“इस प्रकार, इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में एकतरफा रद्दीकरण अवैध है, और इसे 99 वर्षों तक वाद पत्र की अनुसूची संपत्ति (Plaint Schedule Property) के कब्जे में रहने के वादी के अधिकार में हस्तक्षेप के रूप में समझा जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल व प्रथम अपीलीय अदालतों द्वारा दी गई राहत को बहाल कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मूल पट्टाकर्ता (original lessor) के पक्ष में जो अधिकार संरक्षित थे, उनका कानूनी उपभोग वर्तमान खरीददार (प्रतिवादी संख्या 3 और 4) कर सकते हैं। मामले में कोई लागत (costs) नहीं लगाई गई।
- केस का नाम: द जनरल सेक्रेटरी, विवेकानंद केंद्र बनाम प्रदीप कुमार अग्रवाल और अन्य
- केस नंबर: 2026 की सिविल अपील संख्या (@ विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 9558/2023)

