केवल देरी से भुगतान के आधार पर कानूनन किराएदार को कोऑपरेटिव सोसाइटी की सदस्यता से नहीं रोका जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी हाउसिंग सोसाइटी में लंबे समय से रह रहे कानूनन किराएदार (Lawful Tenant) को केवल इस आधार पर सदस्यता देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने शुरुआती योगदान राशि जमा करने में देरी की है।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने शशिन पटेल और अन्य बनाम उदय दलाल और अन्य (2026 INSC 125) के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भुगतान में देरी के कारण फ्लैट मालिकों की सदस्यता खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने माना कि दशकों से फ्लैट पर कब्जा रखने वाले निवासियों को सदस्यता से वंचित करना एक “गंभीर विसंगति” (Serious Anomaly) पैदा करेगा।

शीर्ष अदालत ने डिविजनल जॉइंट रजिस्ट्रार के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें अपीलकर्ताओं को ‘मालबोरो हाउस को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड’ के सदस्य के रूप में मान्यता दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुंबई के पेडर रोड स्थित ‘मालबोरो हाउस’ के फ्लैट नंबर 7 से जुड़ा है। यह इमारत मूल रूप से मैसर्स कमानी ब्रदर्स प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व में थी और इसके सभी सात फ्लैटों में किराएदार रहते थे। जब कंपनी परिसमापन (Liquidation) में गई, तो किराएदारों ने कंपनी का बकाया चुकाकर इमारत का स्वामित्व हासिल करने के लिए एक कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाने का निर्णय लिया।

ऑफिशियल लिक्विडेटर ने 1995 में सोसाइटी के पक्ष में ‘कन्वेयंस डीड’ निष्पादित की। जहां छह किराएदारों ने अपनी हिस्सेदारी का भुगतान किया, वहीं फ्लैट नंबर 7 के निवासी श्री नरेंद्र पटेल (अपीलकर्ताओं के पूर्वज) ने उस समय 5 लाख रुपये का भुगतान नहीं किया। अपीलकर्ताओं का कहना था कि नरेंद्र पटेल ने राशि की गणना का विवरण मांगा था, जो उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया।

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दशकों बाद, सोसाइटी में कुप्रबंधन के आरोपों के चलते 2025 में एक प्रशासक (Administrator) नियुक्त किया गया। नरेंद्र पटेल के कानूनी उत्तराधिकारियों, शशिन पटेल और भाविनि पटेल ने ब्याज सहित राशि जमा कर सदस्यता के लिए आवेदन किया। जब अधिकृत अधिकारी ने नीतिगत मामला होने का हवाला देकर निर्णय लेने में असमर्थता जताई, तो मामला डिप्टी रजिस्ट्रार और फिर डिविजनल जॉइंट रजिस्ट्रार के पास पहुंचा।

23 अप्रैल 2025 को जॉइंट रजिस्ट्रार ने रिविजन याचिका स्वीकार करते हुए सोसाइटी को निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं को सदस्य बनाया जाए। उन्होंने 2005 की एजीएम (AGM) के प्रस्ताव का हवाला दिया, जिसमें भुगतान प्राप्त होने पर नरेंद्र पटेल को शामिल करने की सहमति दी गई थी। हालांकि, सोसाइटी के तीन अन्य सदस्यों ने इसे बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसने 19 नवंबर 2025 को जॉइंट रजिस्ट्रार के आदेश को रद्द कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कोर्ट में दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से: वकीलों ने तर्क दिया कि उनके पूर्वज भुगतान करने के लिए तैयार थे, बशर्ते उन्हें गणना का विवरण दिया जाता। उन्होंने बताया कि 11 अगस्त 2005 को हुई वार्षिक आम बैठक (AGM) में सोसाइटी ने स्पष्ट प्रस्ताव पारित किया था कि भुगतान मिलने पर पटेल को सदस्य बना लिया जाएगा। चूंकि इस प्रस्ताव को कभी रद्द नहीं किया गया, इसलिए देरी उनके अधिकारों को खत्म नहीं कर सकती, खासकर तब जब उन्होंने अब 9% ब्याज के साथ राशि जमा कर दी है।

प्रतिवादियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने अन्य सदस्यों की ओर से तर्क दिया कि नरेंद्र पटेल ने जानबूझकर योगदान राशि जमा करने से परहेज किया था। उन्होंने कहा कि इमारत को नीलामी से बचाने का वित्तीय बोझ अन्य सदस्यों को उठाना पड़ा। उनका कहना था कि अब संपत्ति की कीमतें बढ़ने के कारण अपीलकर्ता सदस्यता मांग रहे हैं।

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सोसाइटी की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने प्रशासक के माध्यम से सोसाइटी का पक्ष रखते हुए अपीलकर्ताओं का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि चूंकि राशि जमा कर दी गई है, इसलिए उन्हें सदस्य बनाने में कोई अवैधता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि फ्लैट नंबर 7 पर नरेंद्र पटेल और उनके वारिसों का कब्जा निर्विवाद है और उनके खिलाफ कभी कोई बेदखली (Eviction) की कार्यवाही शुरू नहीं की गई।

न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने फैसले में लिखा:

“निर्णायक मुद्दा यह होगा कि क्या अपीलकर्ताओं को परिसर में कब्जा बनाए रखते हुए सोसाइटी की सदस्यता मांगने के लाभ से वंचित किया जा सकता है।”

कोर्ट ने कहा कि कब्जा होने के बावजूद सदस्यता न देना निवासियों के बीच निरंतर संघर्ष और टकराव पैदा करेगा। पीठ ने सोसाइटी के रिकॉर्ड पर भरोसा जताया:

  1. 1995 का प्रस्ताव पत्र: सोसाइटी ने भुगतान पर सदस्यता की पेशकश की थी।
  2. 2005 का एजीएम प्रस्ताव: जनरल बॉडी ने उन्हें शामिल करने का संकल्प लिया था।
  3. 2025 में पुष्टि: कोर्ट ने नोट किया कि 30 सितंबर 2025 को हुई एजीएम में सोसाइटी ने 2005 के निर्णय की पुष्टि की और बाद में फ्लैट के नए खरीदार (मैसर्स कैपिटल माइंड एडवाइजरी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड) की सदस्यता को भी मंजूरी दे दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस तर्क को खारिज कर दिया कि जॉइंट रजिस्ट्रार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्य किया। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया था।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शशिन पटेल और भाविनि पटेल की सदस्यता को मान्यता देना ही एकमात्र न्यायसंगत समाधान है। इसके साथ ही, बाद के खरीदार के पक्ष में किए गए फ्लैट के हस्तांतरण को भी वैध माना गया।

हालांकि, भुगतान में देरी को देखते हुए कोर्ट ने अन्य सदस्यों को राहत देते हुए कहा:

“हम व्यथित सदस्यों को यह छूट देते हैं कि यदि वे चाहें, तो अपीलकर्ताओं द्वारा देय अतिरिक्त राशि या बढ़े हुए ब्याज के निर्धारण के लिए उचित प्राधिकारी के समक्ष आवेदन कर सकते हैं।”

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: शशिन पटेल और अन्य बनाम उदय दलाल और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 36106/2025 से उद्भूत)
  • कोरम: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता

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