एक ही वादी के दो मुकदमों पर आए साझा फैसले के खिलाफ कंपोजिट अपील पोषणीय, बशर्ते फीस और डिक्री दाखिल की गई हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया है कि एक ही वादी द्वारा दायर दो एकीकृत मुकदमों (कंसोलिडेटेड सूट्स) में आए साझा फैसले को चुनौती देने के लिए नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) की धारा 96 के तहत दायर की गई एक एकल ‘कंपोजिट अपील’ (संयुक्त अपील) पोषणीय है। शर्त यह है कि दोनों डिक्री की प्रमाणित प्रतियां प्रस्तुत की गई हों और दोनों चुनौतियों के लिए पूरा कोर्ट फीस चुकाया गया हो। कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने निर्णय दिया कि प्रत्येक मुकदमे के लिए अलग अपील ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ अपील) न होना केवल प्रारूप (फॉर्म) से जुड़ी एक सुधार योग्य प्रक्रियात्मक त्रुटि है, न कि सार (सब्सटेंस) की, और इसके आधार पर किसी याचिकाकर्ता को तकनीकी आधार पर न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

अपार्टियों (वादी) के पूर्वज ने शाहपुर स्थित सिविल कोर्ट में दो दीवानी मुकदमे दायर किए थे। पहला मुकदमा (ओ.एस. संख्या 14/1986) यह घोषणा करने के लिए दायर किया गया था कि सर्वे संख्या 132/1-ए में 8 एकड़ 11 गुंटा जमीन के लिए दूसरे प्रतिवादी द्वारा पहले प्रतिवादी के पक्ष में 16 अप्रैल 1977 को निष्पादित पंजीकृत बिक्री विलेख (सेल डीड) शून्य, अमान्य और वादी पर बाध्यकारी नहीं है। दूसरा मुकदमा (ओ.एस. संख्या 135/1987) पहले प्रतिवादी के खिलाफ दायर किया गया था, जिसमें सर्वे संख्या 132/1-आ में 4 एकड़ 5 गुंटा जमीन पर वादी के कब्जे में हस्तक्षेप को रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा (परमानेंट इंजंक्शन) की मांग की गई थी।

साझा प्रतिवादी द्वारा सीपीसी की धारा 151 के तहत दायर आवेदन पर, जिस पर वादी ने सहमति व्यक्त की थी, ट्रायल कोर्ट ने 16 जून 1988 को दोनों मुकदमों को एक साथ जोड़ने (क्लब करने) का आदेश दिया। एकीकृत कार्यवाही के दौरान दोनों पक्षों के साझा साक्ष्य दर्ज किए गए। 7 दिसंबर 1990 को एक साझा फैसले के माध्यम से ट्रायल कोर्ट ने दोनों मुकदमों को खारिज कर दिया।

मुकदमों के खारिज होने से व्यथित होकर, वादी ने प्रथम अपीलीय अदालत के समक्ष सीपीसी के आदेश 41 नियम 1 के तहत एक एकल कंपोजिट अपील (आर.ए. संख्या 2/1991) दायर की। अपील के साथ, वादी ने दोनों डिक्री की प्रमाणित प्रतियां संलग्न कीं, दोनों डिक्री को चुनौती देने के लिए आवश्यक संयुक्त कोर्ट फीस का भुगतान किया, और सीपीसी के आदेश 41 नियम 1 के तहत फैसले की दूसरी प्रति दाखिल करने से छूट की मांग करते हुए साझा फैसले को रद्द करने और दोनों मुकदमों को डिक्री करने की प्रार्थना की।

प्रथम अपीलीय अदालत ने 17 अगस्त 2007 को अपील स्वीकार कर ली और ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए दोनों मुकदमों को वादी के पक्ष में डिक्री कर दिया। इसके बाद प्रतिवादियों ने कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष दो दूसरी अपीलें (आरएसए संख्या 3214 और 3215/2007) दायर कीं। हाईकोर्ट ने केवल इस प्रक्रियात्मक आधार पर दूसरी अपीलों को स्वीकार कर लिया कि चूंकि दो अलग-अलग मुकदमे दायर किए गए थे, इसलिए वादी को सीपीसी की धारा 96 के तहत दो अलग-अलग अपीलें दायर करना आवश्यक था। नतीजतन, हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और दोनों मुकदमों को खारिज कर दिया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता बसव प्रभु एस. पाटिल ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने मुख्य न्याय के बजाय तकनीकी औपचारिकताओं को प्राथमिकता देकर भूल की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कंपोजिट अपील के साथ दोनों डिक्री की प्रमाणित प्रतियां और दो अलग-अलग अपीलों के लिए आवश्यक पूरा कोर्ट फीस जमा किया गया था। चूंकि दोनों मुकदमों को प्रतिवादी के कहने पर ही जोड़ा गया था, साझा साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे और एक साझा फैसला सुनाया गया था, इसलिए अपीलकर्ताओं को अपील से बाहर करने का कोई औचित्य नहीं था। उन्होंने आगे कहा कि हाईकोर्ट के फैसले ने अपीलकर्ताओं के दावों के गुणों-दोषों पर बिना किसी विचार के उन्हें उपायहीन (रेमेडीलेस) छोड़ दिया। उन्होंने मल्लन्ना उर्फ अप्पय्या बनाम श्रीमती मुनिनंजम्मा उर्फ नंजम्मा और कर्नाटका स्टेट एग्रो कॉर्न प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम मेसर्स केरल एग्रो सीड्स जैसे नजीरों को अलग बताते हुए अपनी दलीलें रखीं।

प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता शरणगौड़ा पाटिल ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि मुकदमों के एकत्रीकरण और साझा फैसले के बावजूद, सीपीसी की धारा 96 के तहत दो स्वतंत्र अपीलें दायर करना अनिवार्य था। उन्होंने दावा किया कि दो डिक्री को चुनौती देने वाली एक एकल अपील कानूनी रूप से पोषणीय नहीं थी और कहा कि हाईकोर्ट ने मल्लन्ना उर्फ अप्पय्या, मेसर्स एस.ए.एल. स्टील लिमिटेड बनाम मेसर्स श्रीनिधि ट्रेडिंग कंपनी और श्री दिनेश पूजारी बनाम श्री वेंकप्पा गौड़ा में स्थापित कानून को सही ढंग से लागू किया था।

अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने सीपीसी के प्रक्रियात्मक प्रावधानों की जांच की और ध्यान दिलाया कि सीपीसी की धारा 151 के तहत मुकदमों का एकत्रीकरण मुकदमों की बहुलता, देरी और अनावश्यक लागत से बचने के लिए किया जाता है। मेसर्स चितिवलासा जूट मिल बनाम मेसर्स जेपी रीवा सीमेंट का हवाला देते हुए, अदालत ने टिप्पणी की कि मुकदमों का एकत्रीकरण पक्षों को दो अलग-अलग मुकदमों में एक ही साक्ष्य दोहराने से राहत देता है।

अदालत ने नोट किया कि सीपीसी के आदेश 41 नियम 1(1) का प्रावधान अपीलीय अदालत को यह अधिकार देता है कि जब दो या दो से अधिक मुकदमों की सुनवाई एक साथ होती है, तो वह फैसले की एक से अधिक प्रति दाखिल करने से छूट दे सकती है। पी.ए. उम्मन बनाम मोरन मार बेसेलियस मार्थोमा का उल्लेख करते हुए, अदालत ने माना कि इस प्रावधान का उद्देश्य अनावश्यक खर्चों से बचाना है। अदालत ने पाया कि वादी ने अलग कोर्ट फीस का भुगतान करने, दोनों डिक्री की प्रमाणित प्रतियां जमा करने और दोनों डिक्री को रद्द करने की स्पष्ट प्रार्थना करने सहित सभी वैधानिक आवश्यकताओं का पालन किया था।

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प्रक्रियात्मक त्रुटि की प्रकृति पर बात करते हुए शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की:

“कमी, यदि कोई थी, तो वह केवल प्रत्येक अपील के लिए एक अलग अपील ज्ञापन न होने की थी। दूसरे शब्दों में, जो काम दो अलग-अलग अपीलें दायर करके किया जा सकता था, वह एक संयुक्त (कंपोजिट) अपील दायर करके किया गया। यह कमी ‘फॉर्म’ (प्रारूप) की अधिक थी, ‘सब्सटेंस’ (सार) की नहीं। यह एक सुधार योग्य कमी थी और इससे कंपोजिट अपील अप्रभावी या अमान्य नहीं हो जाती।”

अदालत ने कहा कि यदि हाईकोर्ट अलग अपील ज्ञापन को आवश्यक समझता भी था, तो भी किसी फैसले को मेरिट पर रद्द करने के बजाय प्रक्रियात्मक कमी को दूर करने का अवसर दिया जाना चाहिए था। चरण सिंह बनाम राम स्वरूप का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:

“‘प्रारूप’ को ‘सार’ पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। प्रक्रिया संहिता में दिए गए नियम न्याय प्रक्रिया में सहायता के लिए हैं, न कि कार्यवाही को खारिज करने के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने के लिए।”

सीपीसी की धारा 11 के तहत प्रांगन्याय (रेस ज्यूडिकाटा) के नियम का मूल्यांकन करते हुए, अदालत ने मनोहर विनायक बनाम लक्ष्मण आनंदराव देशमुख और नरहरि बनाम शंकर के मामलों का विश्लेषण किया और कहा:

“अब यह पूरी तरह से तय हो चुका है कि जहां एक ही सुनवाई, एक ही निष्कर्ष और एक ही फैसला हुआ हो, वहां दो अपीलें दायर करने की आवश्यकता नहीं होती, भले ही दो अलग-अलग डिक्री क्यों न तैयार की गई हों।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि रेस ज्यूडिकाटा के नियम फैसलों पर लागू होते हैं, डिक्री पर नहीं। चूंकि दोनों मुकदमों का फैसला करने वाले एक ही निर्णय को कंपोजिट अपील में सीधे चुनौती दी गई थी, इसलिए रेस ज्यूडिकाटा की बाधा यहां लागू नहीं होती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों द्वारा पेश किए गए उदाहरणों को खारिज कर दिया। मल्लन्ना उर्फ अप्पय्या, श्री दिनेश पूजारी और मेसर्स एस.ए.एल. स्टील लिमिटेड में विरोधी पक्षों द्वारा अलग-अलग मुकदमे दायर किए गए थे या काउंटर-क्लेम शामिल थे, जिनकी सुनवाई अलग हुई थी या डिक्री को चुनौती नहीं दी गई थी, जिसके कारण स्वतंत्र अपीलों की आवश्यकता थी। इसके विपरीत, वर्तमान मामले में दोनों मुकदमे एक ही वादी द्वारा लाए गए थे। अदालत ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के निर्णय (रमेश चंद बनाम ओम राज) के साथ अपनी सहमति व्यक्त की, जिसमें कहा गया था कि साझा निर्णय द्वारा तय किए गए एकीकृत मुकदमों को एक ही अपील के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।

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अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपीलों को स्वीकार कर लिया और 2 सितंबर 2022 के कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कानूनी प्रश्न का उत्तर देते हुए घोषणा की कि वादी द्वारा सीपीसी की धारा 96 के तहत दायर कंपोजिट अपील उन परिस्थितियों में पोषणीय थी जिनमें उसे प्रस्तुत किया गया था।

अदालत ने दोनों दूसरी अपीलों (आरएसए संख्या 3214/2007 और 3215/2007) को कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष गुण-दोष (मेरिट्स) पर नए सिरे से विचार करने के लिए बहाल कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि उसने संपत्ति विवाद के मुख्य गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: बसन्ना (मृतक) कानूनी वारिसों के माध्यम से और अन्य बनाम भीमन्ना और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 9923-9924/2026
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
निर्णय की तिथि: 12 अगस्त 2026

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