पुणे पोर्श हादसा: सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों को दी ज़मानत, कहा– नाबालिगों के अपराधों के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2024 के पुणे पोर्श हादसे से जुड़े बहुचर्चित मामले में तीन आरोपियों को ज़मानत दे दी। इसके साथ ही अदालत ने नाबालिगों के अपराधों में माता-पिता की भूमिका पर सख्त टिप्पणी की।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भूइयां की पीठ ने कहा कि आज माता-पिता अपने बच्चों पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं।

“नशा करना एक बात है, लेकिन बच्चों को गाड़ी की चाबी और ऐश करने के लिए पैसे देना स्वीकार्य नहीं है,” अदालत ने टिप्पणी की।

सुप्रीम कोर्ट ने अमर संतोष गायकवाड़, आदित्य अविनाश सूद (52 वर्ष) और आशीष सतीश मित्तल (37 वर्ष) को ज़मानत दी। तीनों पर मई 2024 में हुए घातक हादसे के बाद कथित रूप से नाबालिग आरोपी के खून के नमूने बदलवाने की साजिश रचने का आरोप है।

गायकवाड़, जिनकी ओर से वकील सना रईस खान ने पक्ष रखा, पर आरोप है कि उन्होंने एक डॉक्टर के सहायक को नाबालिग का रक्त नमूना बदलवाने के लिए ₹3 लाख की रिश्वत दी।

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सूद और मित्तल को अगस्त 2024 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने जानबूझकर अपने रक्त के नमूने प्रयोगशाला में जमा कराए ताकि उन्हें नाबालिग के साथ कार में मौजूद दो अन्य नाबालिगों के रूप में पेश किया जा सके। दोनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और सिद्धार्थ अग्रवाल ने पक्ष रखा।

यह मामला 19 मई 2024 को पुणे के कालेयानी नगर इलाके में हुआ था, जहां एक 17 वर्षीय नाबालिग ने शराब के नशे में पोर्श कार चलाते हुए दो आईटी पेशेवरों को कुचल दिया था। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई थी।

इस घटना के बाद देशभर में भारी रोष देखने को मिला, खासतौर पर जब किशोर न्याय बोर्ड (JJB) ने आरोपी नाबालिग को सिर्फ 300 शब्दों का सड़क सुरक्षा पर निबंध लिखने जैसी शर्तों पर ज़मानत दे दी।

पुणे पुलिस की पुनर्विचार याचिका पर बोर्ड ने अपने आदेश में बदलाव करते हुए नाबालिग को सुधारगृह भेजा। हालांकि, जून 2024 में हाई कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया।

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खून के नमूने बदलने की साजिश सामने आने के बाद मामले की जांच का दायरा और बड़ा हो गया। नाबालिग के माता-पिता विशाल अग्रवाल और शिवानी अग्रवाल, डॉक्टर अजय तावरे और श्रीहरी हालनोर, ससून अस्पताल के कर्मचारी अतुल घाटकंबले, दो बिचौलिए, आदित्य सूद, आशीष मित्तल और अरुण कुमार सिंह समेत कुल 10 आरोपियों को जेल भेजा गया था।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर 2024 को गायकवाड़, सूद और मित्तल सहित आठ आरोपियों की ज़मानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन को राहत दिए जाने के साथ, यह मामला फिर चर्चा में आ गया है।

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यह मामला न केवल किशोर न्याय प्रणाली की खामियों को उजागर करता है, बल्कि सामाजिक जवाबदेही, अभिभावकों की भूमिका और संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे गहरे मुद्दों पर भी सवाल उठाता है।

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