अहमदाबाद के वेजलपुर पुलिस स्टेशन में 70 वर्षीय जहीरुद्दीन शेख की कथित हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने गुजरात सरकार को तुरंत प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर को पीड़ित परिवार की सुरक्षा की समीक्षा कर उन्हें आवश्यक सुरक्षा मुहैया कराने का भी हुक्म दिया है।
तीन महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करने का हुक्म
मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत में हुई किसी भी अप्राकृतिक मौत के मामले में यदि आपत्तिजनक सामग्री सामने आती है, तो एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए। अदालत के आदेश के मुताबिक, डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (डीसीपी) स्तर के अधिकारी की अगुआई में बनने वाली इस एसआईटी में गुजरात के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) द्वारा नामित दो अन्य अधिकारी शामिल होंगे। एसआईटी को तीन महीने के भीतर अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष जमा करनी होगी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता जांच के निष्कर्ष से असंतुष्ट रहता है, तो वह विरोध याचिका दाखिल कर आगे की जांच की मांग कर सकता है।
जबरन दवा खिलाने और प्रताड़ना का आरोप
यह मामला 18 मई का है, जब वेजलपुर पुलिस ने जहीरुद्दीन शेख को मवेशी वध के एक मामले में गिरफ्तार किया था। हिरासत के दौरान तबीयत बिगड़ने पर उन्हें एसवीपी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 19 मई को उनकी मृत्यु हो गई। स्थानीय पुलिस ने इसे महज एक अप्राकृतिक मौत (एक्सीडेंटल डेथ) के रूप में दर्ज किया था, जबकि परिजनों का आरोप है कि पुलिस हिरासत में उनके साथ गंभीर मारपीट और अमानवीय प्रताड़ना की गई। मृतक के बेटे तोफिक शेख द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिसकर्मियों ने उनके पिता को जबरन मधुमेह (डायबिटीज) की 30 से 40 गोलियां खिला दीं, जिससे ओवरडोज के कारण उनकी जान चली गई।
मृत्यु पूर्व बयान बने जांच का मुख्य आधार
याचिका के अनुसार, दम तोड़ने से पहले जहीरुद्दीन ने दो मृत्यु पूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) दिए थे। इनमें से एक बयान एसवीपी अस्पताल के मेडिको-लीगल रिकॉर्ड में दर्ज है, जबकि दूसरा बयान दो वीडियो रिकॉर्डिंग के रूप में मौजूद है, जिसमें उन्होंने जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के नाम और उन पर हुए हमले का ब्योरा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इन साक्ष्यों पर गौर करते हुए टिप्पणी की कि ये मृत्यु पूर्व बयान प्रथम दृष्टया शारीरिक हमले की पुष्टि करते हैं। पीठ ने पाया कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के प्रावधानों के तहत शुरुआती चरण में बिना किसी विशिष्ट संदिग्ध का नाम दर्ज किए एफआईआर दर्ज करने के पर्याप्त आधार हैं।
राज्य सरकार की दलीलें खारिज
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने एफआईआर के बजाय केवल प्रारंभिक जांच कराने का अनुरोध किया था। उन्होंने तर्क दिया कि मामले की मजिस्ट्रेट जांच पहले से चल रही है और पांच डॉक्टरों के पैनल द्वारा किए गए पोस्टमार्टम में शरीर पर चोट के कोई बाहरी निशान नहीं पाए गए हैं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील आई. एच. सैयद ने अदालत को बताया कि स्थानीय पुलिस आरोपी अधिकारियों को बचा रही है और पीड़ित परिवार को धमकियां दी जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की दलीलों को खारिज करते हुए एसआईटी जांच का रास्ता साफ कर दिया।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप गुजरात हाईकोर्ट के 29 मई के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया है, जिसमें परिजनों की याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि उन्हें पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत उपलब्ध वैधानिक उपायों का उपयोग करना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने भी प्रक्रियात्मक सीमाओं पर चिंता जताई थी और कहा था कि संज्ञेय अपराधों में एफआईआर दर्ज करने के अनिवार्य कानूनी सिद्धांतों (ललिता कुमारी फैसला) के बावजूद तकनीकी कारणों से सीधे राहत न दे पाना विडंबनापूर्ण है।

