अंतरिम आदेश से “सीधे प्रभावित” व्यक्ति को रिट कार्यवाही में पक्षकार बनने से नहीं रोका जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक संपत्ति मालिक को राज्य के भवन नियमों को चुनौती देने वाली रिट याचिका में पक्षकार (Impleadment) बनने से मना कर दिया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि जो पक्षकार किसी अंतरिम आदेश से “प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप से प्रभावित” होता है, उसे कार्यवाही से बाहर नहीं रखा जा सकता, भले ही वह मूल चुनौती में पक्षकार न रहा हो।

अदालत ने कहा कि नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश I नियम 10 के सिद्धांत अनुच्छेद 226 के तहत रिट कार्यवाही में मार्गदर्शन का काम करते हैं, ताकि आवश्यक और उचित पक्षों की उपस्थिति से पूर्ण न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, मेसर्स चोपड़ा होटल्स प्राइवेट लिमिटेड, जालंधर में एक व्यावसायिक संपत्ति का मालिक है। 2024 में ‘कम्प्लीशन सर्टिफिकेट’ के आवेदन के दौरान, फ्रंट सेटबैक (front setback) को लेकर एक विसंगति पाई गई। अपीलकर्ता का दावा था कि पंजाब यूनिफाइड बिल्डिंग रूल्स, 2025 के तहत उनकी इमारत नियमों के अनुरूप हो गई है, क्योंकि इन नए नियमों में न्यूनतम फ्रंट सेटबैक की आवश्यकता को घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया था।

हालांकि, 2025 के इन नियमों को एक अलग रिट याचिका (CWP संख्या 38742/2025) में चुनौती दी गई थी। 24 दिसंबर, 2025 को हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित कर 2025 के नियमों के उन प्रावधानों पर रोक लगा दी थी जो पुराने नियमों के विपरीत थे।

इस अंतरिम आदेश का हवाला देते हुए, नगर निगम अधिकारियों ने 5 फरवरी, 2026 को अपीलकर्ता की इमारत को सील कर दिया और तोड़फोड़ (demolition) का आदेश जारी किया। जब अपीलकर्ता ने 2025 के नियमों के तहत राहत मांगी, तो अधिकारियों और बाद में हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि डिवीजन बेंच ने इन नियमों पर रोक लगा रखी है।

READ ALSO  अनुच्छेद 21 के खिलाफ जमानत के अधिकार को विफल करने के लिए जांच पूरी करने से पहले टुकड़ा-टुकड़ा चार्जशीट दाखिल करना: दिल्ली हाईकोर्ट

इसके बाद अपीलकर्ता ने मुख्य रिट याचिका में पक्षकार बनने और अंतरिम आदेश के स्पष्टीकरण के लिए आवेदन किया। हाईकोर्ट ने 26 फरवरी, 2026 को इन आवेदनों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अपीलकर्ता का इस मामले में कोई ‘विवाद’ (lis) नहीं है और वह आवश्यक पक्षकार नहीं है।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क को खारिज कर दिया कि अपीलकर्ता इस विवाद के लिए अजनबी था। पीठ ने गौर किया कि अधिकारी अपीलकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए इसी अंतरिम आदेश का सक्रिय रूप से उपयोग कर रहे थे।

पक्षकार बनाने के सिद्धांत

मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड बनाम रीजेंसी कन्वेंशन सेंटर एंड होटल्स प्राइवेट लिमिटेड (2010) मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:

“रिट कार्यवाही में, जहाँ अदालत को अपने द्वारा पारित अंतरिम आदेश के दायरे और संचालन की व्याख्या करने की आवश्यकता होती है, वहां जो व्यक्ति उस आदेश से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है, उसे केवल इसलिए बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि वह मूल चुनौती में पक्षकार नहीं था।”

अंतरिम आदेश का सीधा प्रभाव

अदालत ने पाया कि बाद की कार्यवाहियों से यह “संदेह से परे” साफ हो गया कि 2025 के नियमों पर लगी रोक का अपीलकर्ता पर सीधा असर पड़ा। पीठ ने टिप्पणी की:

“कम से कम, अपीलकर्ता एक ‘उचित पक्षकार’ (proper party) था जिसकी उपस्थिति हाईकोर्ट को अपने ही अंतरिम आदेश के परिणामों को बेहतर और निष्पक्ष तरीके से समझने में मदद करती।”

READ ALSO  पूर्व जस्टिस और सस्पेंड मजिस्ट्रेट के मध्य फोन वार्तालाप की जांच नही कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

उपचारों का अंतर्संबंध

अदालत ने मामले की प्रक्रियात्मक जटिलता पर भी ध्यान दिया, जिसमें मुख्य रिट याचिका, लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) और तोड़फोड़ के खिलाफ सिविल रिवीजन (CR) जैसे कई मामले लंबित थे। पीठ ने कहा कि भले ही ये मामले आपस में जुड़े हुए हैं, लेकिन मुख्य याचिका लंबित होने के कारण अन्य उपचारों को “अनिश्चित काल के लिए निष्क्रिय” नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 26 फरवरी, 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. पक्षकार बनने की अनुमति: CWP संख्या 38742/2025 में पक्षकार बनने के अपीलकर्ता के आवेदन को स्वीकार किया जाता है और उन्हें प्रतिवादी के रूप में जोड़ा जाएगा।
  2. स्वतंत्र सुनवाई: हाईकोर्ट मुख्य रिट याचिका पर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र है।
  3. जुड़े हुए मामलों की संयुक्त सुनवाई: LPA संख्या 760/2026 और CR संख्या 2579/2026 की सुनवाई एक साथ की जाएगी और इनका निर्णय पिछले आदेशों से प्रभावित हुए बिना योग्यता के आधार पर होगा।
  4. यथास्थिति (Status Quo): हाईकोर्ट द्वारा LPA और सिविल रिवीजन का निपटारा होने तक विवादित संपत्ति के संबंध में दोनों पक्ष यथास्थिति बनाए रखेंगे।
READ ALSO  पत्नी द्वारा पति को माता-पिता से अलग रहने के लिए मजबूर करना क्रूरता, दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक को बरकरार रखा

पीठ ने स्पष्ट किया कि उन्होंने इमारत के नियमों के अनुपालन या 2025 के नियमों की वैधता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और ये सभी सवाल हाईकोर्ट के विचार के लिए खुले रखे गए हैं।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: मेसर्स चोपड़ा होटल्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरबिंदर सिंह सेखों और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 4880-4881/2026 (SLP (C) संख्या 9321-9322/2026 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • तारीख: 08 अप्रैल, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles