कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबन को चुनौती देने वाली CBI की याचिका पर अब मई में होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उन्नाव बलात्कार मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई टाल दी है। इस मामले को अब मई के पहले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले पर सुनवाई तब शुरू होगी जब नौ जजों की बेंच सबरीमाला समीक्षा याचिकाओं पर अपनी सुनवाई पूरी कर लेगी।

इस मामले की जड़ 23 दिसंबर, 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पारित वह आदेश है, जिसमें सेंगर की उम्रकैद की सजा को उसकी अपील लंबित रहने तक निलंबित कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपने तर्क में कहा था कि सेंगर पहले ही सात साल और पांच महीने जेल में बिता चुका है। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि हालांकि सेंगर को POCSO अधिनियम की धारा 5 (C) (लोक सेवक द्वारा यौन हमला) के तहत दोषी ठहराया गया है, लेकिन आईपीसी की धारा 21 के तहत एक निर्वाचित प्रतिनिधि ‘लोक सेवक’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता है।

CBI ने इस व्याख्या का कड़ा विरोध किया है। अपनी याचिका में एजेंसी ने एल.के. आडवाणी मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सांसद या विधायक जैसे सार्वजनिक पदों पर बैठने वाले व्यक्ति ‘लोक सेवक’ ही माने जाते हैं। सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे एक नाबालिग के साथ हुआ “जघन्य अपराध” बताते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक जारी रखने की मांग की।

पिछले साल 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी, जिससे सेंगर की जेल से रिहाई रुक गई थी। सोमवार को पीठ ने दोहराया कि इस मामले में “कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न” शामिल हैं, जिन पर विस्तृत विचार की आवश्यकता है।

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सेंगर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने उनकी रिहाई की वकालत करते हुए कहा कि सेंगर पीड़िता के पिता की हिरासत में हुई मौत के मामले में भी 10 साल की सजा काट रहे हैं। रोहतगी ने दावा किया कि सेंगर ने उस सजा का बड़ा हिस्सा पूरा कर लिया है और दिल्ली हाईकोर्ट में उस अपील पर सुनवाई में देरी हो रही है। उन्होंने तर्क दिया, “10 साल की सजा जल्द ही पूरी होने वाली है, लेकिन हाईकोर्ट में अभी तक कोई ठोस सुनवाई नहीं हुई है। मुझे इस मामले में जमानत मिलनी चाहिए।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पीड़िता के वकील जानबूझकर तारीखें ले रहे हैं।

जवाब में पीड़िता की ओर से पेश वकील महमूद प्राचा ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट में केवल एक बार स्थगन मांगा गया था। चीफ जस्टिस ने दोनों पक्षों की इस सहमति को दर्ज किया कि अब दिल्ली हाईकोर्ट में किसी भी पक्ष द्वारा स्थगन की मांग नहीं की जाएगी।

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पीठ ने कहा, “वकील हाईकोर्ट में पूर्ण सहयोग प्रदान करेंगे।”

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वह आमतौर पर संबंधित व्यक्ति को सुने बिना जमानत या सजा निलंबन के आदेश पर रोक नहीं लगाता है, लेकिन इस मामले की “विशिष्ट परिस्थितियों” और इसमें शामिल गंभीर कानूनी सवालों को देखते हुए सेंगर की रिहाई पर रोक बरकरार रखना आवश्यक है।

उन्नाव बलात्कार मामला, जिसे 2019 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उत्तर प्रदेश से दिल्ली स्थानांतरित किया गया था, सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्तियों की जवाबदेही से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामला बना हुआ है।

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