निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के मामलों में अक्सर आरोपी यह बचाव लेते हैं कि चेक केवल “सिक्योरिटी” के तौर पर दिया गया था। लेकिन क्या केवल इतना कह देना काफी है? कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि चेक बाउंस के मामले में महज यह दावा करना कि ‘चेक सुरक्षा के लिए था’, आरोपी को बरी कराने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को इस दावे को साबित करने के लिए ठोस सबूत (Cogent Evidence) पेश करने होंगे।
कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस अजय कुमार गुप्ता की पीठ ने चेक बाउंस मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखते हुए आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Application) खारिज कर दी।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद 6 लाख रुपये के एक ‘एकोमोडेशन लोन’ से जुड़ा है। शिकायतकर्ता कार्तिक चंद्र बसु के मुताबिक, आरोपी कौशिक बारुई ने उनसे 6 लाख रुपये उधार मांगे थे। पैसे मिलने के बाद, आरोपी ने इसे चुकाने के लिए एक चेक दिया।
जब 1 सितंबर 2006 को यह चेक बैंक में लगाया गया, तो खाते में पैसे न होने (Insufficient Funds) के कारण यह बाउंस हो गया। शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन जब भुगतान नहीं मिला, तो मामला कोर्ट पहुंचा।
अलीपुर के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 2011 में आरोपी को दोषी करार देते हुए 2 महीने की कैद और 8 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसमें से 7.95 लाख रुपये शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर दिए जाने थे। सत्र न्यायालय (Sessions Court) ने भी इस फैसले को सही ठहराया, जिसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
आरोपी की दलीलें: “मैंने तो सिर्फ 1 लाख रुपये लिए थे”
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने निचली अदालतों के फैसले को चुनौती देते हुए मुख्य रूप से तीन तर्क रखे:
- कोई लिखित समझौता नहीं: आरोपी का कहना था कि 6 लाख रुपये के लोन का कोई लिखित एग्रीमेंट मौजूद नहीं है।
- सिक्योरिटी चेक का दुरुपयोग: सबसे अहम दलील यह थी कि आरोपी ने पलाश चटर्जी नामक व्यक्ति से सिर्फ 1 लाख रुपये का लोन लिया था और यह चेक ‘सिक्योरिटी’ के तौर पर दिया गया था। आरोपी का आरोप था कि शिकायतकर्ता ने उस चेक का गलत इस्तेमाल कर 6 लाख रुपये की देनदारी बना दी।
- नोटिस नहीं मिला: आरोपी ने यह भी दावा किया कि उसे चेक बाउंस का लीगल नोटिस ठीक से तामील नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस अजय कुमार गुप्ता ने मामले की सुनवाई करते हुए कानून की बारीकियों पर विस्तार से चर्चा की। कोर्ट ने माना कि एनआई एक्ट की धारा 138 और 139 के तहत, एक बार जब चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार कर लिए जाते हैं, तो कानून यह मानकर चलता है (Presumption) कि यह चेक किसी कर्ज या देनदारी को चुकाने के लिए दिया गया है। इस धारणा को गलत साबित करने का भार आरोपी पर होता है।
अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ:
- सिक्योरिटी चेक की दलील पर: कोर्ट ने आरोपी के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया कि चेक किसी और लोन के लिए सिक्योरिटी था। जस्टिस गुप्ता ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“कोई भी व्यक्ति 1 लाख रुपये का लोन लेने के लिए 6 लाख रुपये का चेक जारी नहीं करेगा… जब तक इस बात को उचित सबूतों से साबित नहीं किया जाता, कोर्ट ऐसी दलीलों को कोई महत्व नहीं दे सकता।” - लिखित एग्रीमेंट जरूरी नहीं: लिखित समझौते के अभाव पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर पक्षकारों के बीच अच्छे संबंध हैं, तो बिना लिखित एग्रीमेंट के भी लोन दिया जाना स्वाभाविक है। इस आधार पर शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता।
- सबूतों का पुनर्मूल्यांकन नहीं: हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि पुनरीक्षण (Revision) क्षेत्राधिकार के तहत वह सबूतों को फिर से नहीं तौल सकता, जब तक कि निचली अदालत के फैसले में कोई बड़ी कानूनी गलती न हो।
फैसला
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी अपनी बेगुनाही साबित करने या “संभावित बचाव” (Probable Defence) खड़ा करने में पूरी तरह विफल रहा है। केवल जुबानी तौर पर जिम्मेदारी से इनकार करना काफी नहीं है।
नतीजतन, कोर्ट ने कौशिक बारुई की याचिका खारिज कर दी और निचली अदालत की सजा को बरकरार रखा। कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि फैसले की कॉपी तुरंत ट्रायल कोर्ट को भेजी जाए ताकि सजा पर अमल किया जा सके।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: कौशिक बारुई बनाम कार्तिक चंद्र बसु और अन्य
- केस नंबर: C.R.R. 969 of 2015
- कोरम: माननीय न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता

