सार्वजनिक उपयोग की भूमि की श्रेणी बदलने का अधिकार उप-जिलाधिकारी के पास नहीं; सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में जारी पट्टों को ‘शून्य’ घोषित किया

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उप-जिलाधिकारी (एसडीओ) के पास कृषि पट्टे देने के उद्देश्य से “सार्वजनिक उपयोग की भूमि” को “कृषि योग्य भूमि” में बदलने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि इस तरह का श्रेणी परिवर्तन क्षेत्राधिकार की गंभीर त्रुटि है, जिससे इसके आधार पर जारी किए गए सभी पट्टे शुरू से ही ‘शून्य’ (void ab initio) माने जाएंगे।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्र और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने बाबू सिंह नामक व्यक्ति द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में चकबंदी कार्यवाही के दौरान राजस्व रिकॉर्ड से उसका नाम हटाने के फैसले को बरकरार रखा गया था।

विवाद की पृष्ठभूमि

अक्टूबर 1992 से पहले, विवादित भूमि यू.पी. लैंड रिकॉर्ड्स मैनुअल के तहत खतौनी में “श्रेणी-6” के रूप में दर्ज थी। श्रेणी-6 में बंजर या गैर-कृषि भूमि शामिल होती है, जिसमें सड़क, भवन, जलमग्न क्षेत्र और सार्वजनिक उपयोग की जमीनें आती हैं। विशेष रूप से, यह भूमि ‘खलिहान’ और चरागाह के रूप में दर्ज थी।

1992 में, लेखपाल और तहसीलदार की रिपोर्ट के आधार पर, एसडीओ ने जमीन को श्रेणी-6 से श्रेणी-5 (कृषि योग्य भूमि) में बदलने की सिफारिश को मंजूरी दे दी। इस बदलाव के बाद, अपीलकर्ता और अन्य लोगों को जमीन के पट्टे आवंटित कर दिए गए।

वर्षों बाद, यू.पी. जोत चकबंदी अधिनियम के तहत चकबंदी के दौरान, 2016 की एक रिपोर्ट में यह सामने आया कि यह भूमि मूल रूप से सार्वजनिक उपयोग की थी, जो यू.पी. जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 (Abolition Act) की धारा 132 के दायरे में आती है। इसके आधार पर, चकबंदी अधिकारी ने अपीलकर्ता का नाम रिकॉर्ड से काटकर जमीन को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने भी इस निर्णय की पुष्टि की।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता का तर्क था कि मैनुअल के पैराग्राफ का-155-का और यू.पी. लैंड रेवेन्यू एक्ट की धारा 227(4) के तहत एसडीओ को श्रेणी परिवर्तन का अधिकार प्राप्त था। इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि 1994 में अतिरिक्त कलेक्टर ने पट्टों को रद्द करने का आवेदन खारिज कर दिया था, इसलिए ‘रेस ज्यूडिकाटा’ (पूर्व न्याय) के सिद्धांत के तहत दोबारा कार्यवाही नहीं की जा सकती।

प्रतिवादी (राज्य और राजस्व अधिकारी) ने तर्क दिया कि चरागाह और खलिहान जैसी श्रेणी-6 की भूमि धारा 132 के अंतर्गत आती है, जिसमें ‘भूमिधरी’ (स्वामित्व) अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि एसडीओ राजस्व प्रविष्टियों को बदलकर कानून द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं कर सकते।

न्यायालय का विश्लेषण

सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया कि क्या एसडीओ के पास भूमि की श्रेणी बदलने का कानूनी अधिकार था।

1. क्षेत्राधिकार और वैधानिक निषेध: न्यायालय ने पाया कि मैनुअल का पैराग्राफ का-155-का केवल मौजूदा खातेदारों के प्रशासनिक रिकॉर्ड में सुधार से संबंधित है और यह किसी अधिकारी को जमीन की मूल श्रेणी बदलने की शक्ति नहीं देता।

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पीठ ने रेखांकित किया कि धारा 132 स्पष्ट रूप से चरागाह जैसी जमीनों पर भूमिधरी अधिकारों के सृजन को रोकती है। न्यायालय ने कहा:

“यदि अपीलकर्ता की दलीलों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो यह अधीनस्थ अधिकारियों को राजस्व प्रविष्टियों में भूमि की श्रेणी बदलने के माध्यम से इस स्पष्ट वैधानिक निषेध का उल्लंघन करने की अनुमति देगा, जिससे विधायी मंशा पूरी तरह से विफल हो जाएगी।”

न्यायालय ने कानूनी सिद्धांत Quando aliquid prohibetur ex directo, prohibetur et per obliquum (जिसे सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता, उसे परोक्ष रूप से भी नहीं किया जाना चाहिए) का हवाला देते हुए कहा कि यह श्रेणी परिवर्तन कानूनी प्रतिबंधों से बचने का एक प्रयास था।

2. सार्वजनिक उपयोग की भूमि का संरक्षण: हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी और जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामलों का संदर्भ देते हुए न्यायालय ने जोर दिया कि सामुदायिक संसाधनों की रक्षा “पूरी तत्परता के साथ” की जानी चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की:

“इस न्यायालय ने माना है कि प्रशासनिक हेरफेर के माध्यम से सार्वजनिक उपयोग की भूमि को निजी लाभ के लिए परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, और चकबंदी की कार्यवाही का उपयोग सामुदायिक संसाधनों को प्रदान की गई वैधानिक सुरक्षा को दरकिनार करने के माध्यम से नहीं किया जा सकता है।”

3. ‘रेस ज्यूडिकाटा’ की दलील: 1994 के आदेश के संबंध में, न्यायालय ने पाया कि अतिरिक्त कलेक्टर ने आवेदन को केवल इसलिए खारिज किया था क्योंकि उस समय पट्टों के निष्पादन का कोई प्रमाण नहीं था। चूंकि उस समय पट्टों की वैधता पर मेरिट के आधार पर निर्णय नहीं हुआ था, इसलिए ‘रेस ज्यूडिकाटा’ का सिद्धांत लागू नहीं होता।

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अंतिम निर्णय

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि एसडीओ का कदम अधिकार क्षेत्र से बाहर था, जिससे बाद में दिए गए पट्टे अवैध श्रेणी परिवर्तन पर आधारित होने के कारण टिक नहीं सकते।

“चूंकि यह स्थापित हो चुका है कि ऐसी भूमि के संबंध में भूमिधरी अधिकार नहीं मिल सकते, इसलिए अपीलकर्ता के पक्ष में दिए गए पट्टों को बरकरार नहीं रखा जा सकता और उन्हें शुरू से ही शून्य माना जाता है।”

न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय में कोई त्रुटि न पाते हुए अपील को खारिज कर दिया।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: बाबू सिंह बनाम चकबंदी अधिकारी और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 4633/2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्र, न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया
  • दिनांक: 21 अप्रैल, 2026

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