क्या मकान मालिक की मृत्यु के बाद कानूनी उत्तराधिकारी अपनी आवश्यकता के आधार पर बेदखली की मांग कर सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मकान मालिक की मृत्यु के बाद ‘बोनफाइड आवश्यकता’ (वास्तविक जरूरत) के आधार पर बेदखली का दावा स्वतः समाप्त नहीं होता है और कानूनी उत्तराधिकारी अपनी जरूरतों को शामिल करने के लिए वाद-पत्र (plaint) में संशोधन कर सकते हैं। जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसने ऐसे संशोधन की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। पीठ ने स्पष्ट किया कि वाद-पत्र में संशोधन की अनुमति मांगते समय अदालत मामले के गुणों-दोषों (merits) की जांच नहीं कर सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुंबई में 188 वर्ग फुट की एक दुकान से जुड़ा है, जिसके मालिक रघुनाथ गोपाल देशमुख थे। साल 2005 में, मकान मालिक ने किरायेदारों के खिलाफ बेदखली का मुकदमा दायर किया था। वाद-पत्र के पैराग्राफ 4 में उन्होंने उल्लेख किया था कि परिसर की आवश्यकता उनके स्वयं के और उनके “परिवार के सदस्यों” के वास्तविक उपयोग और उपभोग के लिए है।

ट्रायल कोर्ट ने 2016 में इस आधार पर मुकदमा खारिज कर दिया कि मकान मालिक अपनी विशिष्ट जरूरत को साबित करने में विफल रहे। अपील लंबित रहने के दौरान, 24 जुलाई 2022 को मकान मालिक की मृत्यु हो गई। उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में शामिल किया गया, जिन्होंने बाद में वाद-पत्र में संशोधन के लिए आवेदन दिया। उन्होंने बताया कि अब परिसर की आवश्यकता मकान मालिक की पत्नी (एक वकील) और उनके बेटे (एक डॉक्टर) के लिए है।

स्मॉल कॉज कोर्ट की अपीलीय पीठ ने कार्यवाही की बहुलता से बचने के लिए संशोधन की अनुमति दे दी। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि मकान मालिक की मृत्यु के साथ उनकी जरूरत समाप्त हो गई है और संशोधन की अनुमति देने से यह पूरी तरह से एक “नया मामला” बन जाएगा।

पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अनिरुद्ध जोशी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने संशोधन के चरण में ही मामले के गुणों-दोषों में जाकर गलती की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मूल वाद-पत्र में पहले से ही “परिवार के सदस्यों” की जरूरतों का जिक्र था और कानूनी उत्तराधिकारी बाद की घटनाओं को रिकॉर्ड पर लाने के हकदार हैं।

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प्रतिवादियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रवींद्र कुमार रायज़ादा ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि मूल मकान मालिक ने केवल अपनी व्यक्तिगत आवश्यकता के बारे में गवाही दी थी। उन्होंने तर्क दिया कि कानूनी उत्तराधिकारी अपनी जरूरतों के लिए इस मुकदमे को जारी नहीं रख सकते और उन्हें इसके बजाय नया मुकदमा दायर करना चाहिए।

अदालत का विश्लेषण: बाद की घटनाएं और राहत का स्वरूप बदलना (Moulding of Relief)

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने तथ्यों को समझने में चूक की, क्योंकि मूल वाद-पत्र के पैराग्राफ 4 में पहले से ही परिवार के सदस्यों की जरूरतों का उल्लेख था।

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निर्णय के पैराग्राफ 17 में, अदालत ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार किया कि क्या मकान मालिक की मृत्यु के साथ बेदखली का दावा खत्म हो जाता है। पीठ ने कहा:

“यह प्रस्ताव हर मामले में लागू नहीं किया जा सकता। यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।”

अदालत ने माना कि सामान्यतः अधिकारों का फैसला मुकदमे की शुरुआत की तारीख के आधार पर होता है, लेकिन पीठ ने बाद की घटनाओं के आधार पर राहत को ढालने (moulding relief) के सिद्धांत पर जोर दिया। पासुपुलेटी वेंकटेश्वरलू बनाम द मोटर एंड जनरल ट्रेडर्स (1975) मामले का हवाला देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“यदि मुकदमा अदालत में आने के बाद कोई ऐसा तथ्य सामने आता है जिसका राहत के अधिकार पर मौलिक प्रभाव पड़ता है, तो न्यायाधिकरण उससे आंखें नहीं मूंद सकता। जहां न्याय के हित में प्रक्रिया के नियमों को थोड़ा लचीला बनाना जरूरी हो, वहां ऐसा किया जाना चाहिए ताकि वास्तविक न्याय सुनिश्चित हो सके।”

अदालत ने कहा कि कानूनी उपचार को “सार्थक” और “वर्तमान वास्तविकताओं” के अनुरूप बनाने के लिए, अदालतों को कार्यवाही शुरू होने के बाद के घटनाक्रमों पर विचार करना चाहिए, बशर्ते दोनों पक्षों के प्रति निष्पक्षता बनी रहे।

हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं

पीठ ने दोहराया कि अनुच्छेद 227 के तहत, हाईकोर्ट एक अपीलीय अदालत के रूप में सबूतों या मामले के गुणों-दोषों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता है। राज कुमार भाटिया बनाम सुभाष चंद्र भाटिया (2017) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

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“संशोधन की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि प्रस्तावित मामला अंततः मुकदमे में सफल होगा या नहीं।”

सुप्रीम कोर्ट ने सीपीसी के आदेश XLI नियम 25 के तहत मामले को ट्रायल कोर्ट में वापस भेजने के अपीलीय पीठ के फैसले को भी बरकरार रखा।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के 7 अगस्त 2024 के फैसले को रद्द कर दिया। अपीलीय पीठ के आदेश को बहाल किया गया और पक्षकारों को 8 जून 2026 को ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने बेदखली के दावे के गुणों-दोषों की जांच नहीं की है, जिसका फैसला निचली अदालत द्वारा किया जाना है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: विनय रघुनाथ देशमुख बनाम नटवरलाल शामजी गडा और अन्य

केस नंबर: सिविल अपील (SLP (C) No. 8991 of 2025 से उत्पन्न)

पीठ: जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर

तारीख: 24 अप्रैल, 2026

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