संभल मस्जिद सर्वे विवाद: सुप्रीम कोर्ट के 2024 के रोक के आदेश के बावजूद हाईकोर्ट की कार्रवाई पर मस्जिद समिति ने उठाए सवाल

उत्तर प्रदेश के संभल स्थित शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर विवाद मामले में मस्जिद प्रबंधन समिति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान मस्जिद समिति की ओर से वरिष्ठ वकील हुज़ेफा अहमदी ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिसंबर 2024 में देश भर की अदालतों पर धार्मिक स्थलों से जुड़े नए मुकदमों और अंतरिम या अंतिम आदेशों पर लगाई गई रोक के बावजूद हाईकोर्ट इस मामले में आगे नहीं बढ़ सकता था।

जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के समक्ष दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई। यह याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट के 19 मई, 2025 के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई हैं, जिसमें सिविल कोर्ट द्वारा दिए गए मस्जिद सर्वे के आदेश को बरकरार रखा गया था। हाईकोर्ट ने मस्जिद समिति की चुनौती को खारिज करते हुए कोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति और मूल मुकदमे को सुनवाई योग्य माना था।

दिसंबर 2024 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी का आरोप

वरिष्ठ वकील हुज़ेफा अहमदी ने सुनवाई के दौरान कहा कि सबसे पहला और बुनियादी सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर, 2024 के निर्देश के बाद हाईकोर्ट इस मामले में कोई सुनवाई कर सकता था? उन्होंने बताया कि शीर्ष अदालत के इस आदेश से हाईकोर्ट को स्पष्ट रूप से अवगत कराया गया था, फिर भी याचिका पर आगे की कार्यवाही जारी रखी गई।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसंबर, 2024 को पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया था। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि अगले आदेश तक देश की कोई भी अदालत धार्मिक स्थलों, विशेषकर मस्जिदों और दरगाहों पर दावे से जुड़ी नई याचिकाएं स्वीकार नहीं करेगी और न ही लंबित मामलों में कोई प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित करेगी।

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1991 कानून के उद्देश्य और विधायी मंशा पर जोर

बहस के दौरान 1991 के कानून का हवाला देते हुए अहमदी ने कहा कि इस अधिनियम का मूल उद्देश्य धार्मिक स्थलों के विवाद को लंबे समय तक पनपने देने के बजाय उसे शुरुआत में ही समाप्त करना है। 1991 का यह कानून 15 अगस्त 1947 को मौजूद किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने पर पूरी तरह रोक लगाता है। इस कानून के तहत केवल अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को ही अपवाद के रूप में बाहर रखा गया था।

संभल कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद संभल के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में दाखिल उस मुकदमे से शुरू हुआ था, जिसमें दावा किया गया है कि मुगल सम्राट बाबर ने वर्ष 1526 में हरिहर मंदिर को तोड़कर 16वीं सदी की इस मस्जिद का निर्माण कराया था।

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सिविल कोर्ट ने 19 नवंबर, 2024 को मस्जिद परिसर के पहले सर्वेक्षण का आदेश दिया था, जिसे उसी दिन पूरा किया गया। इसके बाद 24 नवंबर, 2024 को किए गए दूसरे सर्वे का मस्जिद समिति ने कड़ा विरोध किया और इसे अदालत की पूर्व अनुमति के बिना किया गया अवैध सर्वे करार दिया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 29 नवंबर, 2024 को चंदौसी स्थित संभल सिविल कोर्ट में चल रही सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी थी और उत्तर प्रदेश सरकार को इलाके में शांति व सौहार्द बनाए रखने का निर्देश दिया था। इसके पश्चात, पिछले वर्ष 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ मस्जिद समिति की अपील स्वीकार करते हुए मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

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मामले में अगली सुनवाई अब 4 अगस्त को निर्धारित की गई है।

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