संसद घेराव के दौरान पुलिस कार्रवाई पर दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी, जांच अधिकारी हटाने की याचिका खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि प्रदर्शन करने का अधिकार किसी भी सूरत में देश की संप्रभुता के प्रतीक स्थलों को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं देता। अदालत ने कहा कि किसी अन्य घटना में पुलिस अधिकारी द्वारा ताकत के कथित अत्यधिक इस्तेमाल के आधार पर उसकी छवि को धूमिल नहीं किया जा सकता और न ही उसे हर मामले में पूर्वाग्रही माना जा सकता है।

जांच अधिकारी को हटाने की मांग पर हाईकोर्ट का निर्णय

यह मामला 68 वर्षीय जरनिगार फातिमा द्वारा दायर याचिका से संबंधित है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उन्हें 24 और 25 मार्च 2025 की दरमियानी रात जाफराबाद पुलिस स्टेशन में गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखा गया था। अदालत के आदेश पर इस मामले की प्रशासनिक जांच का जिम्मा दिल्ली पुलिस के एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा को सौंपा गया था। फातिमा ने याचिका दायर कर मांग की थी कि जांच लांबा से वापस लेकर किसी स्वतंत्र अधिकारी को सौंपी जाए।

वायरल वीडियो और याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील एम. सूफियान सिद्दीकी ने अदालत में तर्क दिया कि 20 जुलाई को नीट पेपर लीक मामले के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आयोजित ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान संदीप लांबा एक महिला को थप्पड़ मारते हुए एक वीडियो में देखे गए थे। इस घटना के बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी शुरू की गई थी। वकील ने कहा कि पुलिस ज्यादती की शिकायत करने वाली बुजुर्ग महिला से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह ऐसे अधिकारी की निष्पक्षता पर भरोसा रखे। उन्होंने दलील दी कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।

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जमीनी परिस्थितियों और निष्पक्ष प्रक्रिया पर कोर्ट के विचार

जस्टिस गिरीश कठपालिया की पीठ ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी को भी निष्पक्ष सुनवाई का मौलिक अधिकार प्राप्त है। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल एक वीडियो क्लिप में महिला को थप्पड़ मारते दिखने के आधार पर किसी अधिकारी को पूरी तरह से दोषी या निष्ठाहीन नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने कहा कि स्थिति को संभालते समय जमीनी हकीकत पर ध्यान देना आवश्यक है। यदि प्रदर्शनकारी संसद परिसर में प्रवेश कर जाते और स्थिति बिगड़ने पर गोलीबारी शुरू होती, तो कई लोगों की जान जा सकती थी। हाईकोर्ट ने कहा कि संप्रभुता की ओर बढ़ रही भीड़ को नियंत्रित करते समय यदि बल प्रयोग की अधिकता का मामला बनता भी है, तो भी बिना पक्ष सुने जांच को किसी अन्य अधिकारी को ट्रांसफर करना संबंधित अधिकारी को बिना सुनवाई के दोषी ठहराने जैसा होगा।

अंतिम निर्णय के लिए सक्षम प्राधिकरण को भेजी गई रिपोर्ट

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सरकारी प्राधिकारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने कोर्ट को बताया कि इस याचिका में अब कोई ठोस मुद्दा शेष नहीं बचा है। उन्होंने अदालत को सूचित किया कि याचिकाकर्ता का बयान दर्ज किया जा चुका है और जांच अधिकारी द्वारा जांच की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। मामले की अंतिम रिपोर्ट निर्णय के लिए सक्षम प्राधिकरण को सौंप दी गई है। इन तथ्यों को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।

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