दिवंगत कर्मचारी की पत्नी से 1.08 लाख रुपये की वसूली का आदेश मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के एक दिवंगत कर्मचारी की विधवा को बड़ी राहत देते हुए 1.08 लाख रुपये की रिकवरी के आदेश को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कर्मचारी की ओर से किसी प्रकार की धोखाधड़ी या तथ्य छिपाने का मामला नहीं बनता है, तो उसकी मृत्यु के बाद प्रशासनिक त्रुटि के कारण दिए गए अतिरिक्त वेतन की वसूली उसकी पत्नी से नहीं की जा सकती।

जस्टिस दीपक खोत की पीठ ने 17 अगस्त को दिए फैसले में कहा कि राज्य प्रशासन ने याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना ही वित्तीय लाभ वापस ले लिया और वसूली का आदेश जारी कर दिया, जो कि गैर-कानूनी है। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि दिवंगत कर्मचारी या उनकी पत्नी ने गलत वेतन निर्धारण के लिए किसी प्रकार का छल या गलत ब्योरा पेश किया था।

निचले वर्ग के कर्मचारियों को कानूनी राहत

फैसले में इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया कि दिवंगत कर्मचारी सरकारी विभाग में एकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे, जो क्लास-III (तृतीय श्रेणी) का पद है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा रफ़ीक मसीह मामले में स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि प्रशासनिक स्तर पर गणना की चूक हुई हो और कर्मचारी की कोई भूमिका न हो, तो निचले वर्ग के कर्मचारियों से अतिरिक्त भुगतान की वसूली नहीं की जा सकती।

इसके अलावा पीठ ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत क्षतिपूर्ति बांड (इंडमनिटी बांड) की दलील को भी खारिज कर दिया। अदालत ने जगदीश प्रसाद दुबे मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि कई वर्ष पहले भुगतान की गई राशि को वापस लेने के लिए पूर्व में लिए गए किसी बांड या वचनपत्र को भूतापक्षी (रेट्रोस्पेक्टिव) रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

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वेतन विवाद और रिकवरी का मामला

यह कानूनी विवाद राज्य सरकार के 30 मार्च 2016 के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा है, जिसके तहत दिवंगत कर्मचारी की पत्नी से 1.08 लाख रुपये लौटाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता के पति 21 जनवरी 1982 को सरकारी सेवा में नियुक्त हुए थे और 31 अगस्त 2015 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें सक्षम प्राधिकारियों द्वारा स्वीकृत क्रमोन्नति और टाइम-स्केल वेतनमान के लाभ प्राप्त हुए थे।

कर्मचारी के निधन के बाद विभागीय अधिकारियों ने उनके सेवा रिकॉर्ड का पुनर्मूल्यांकन किया। सरकार का दावा था कि उनके ऑप्शन फॉर्म के अनुसार वेतन निर्धारण 1 जुलाई 2006 से लागू होना चाहिए था, जबकि उस समय सरकार ने इसे 1 अप्रैल 2006 से लागू कर दिया था। इसी समयावधि के अंतर को आधार बनाकर विभाग ने 1.08 लाख रुपये के अतिरिक्त भुगतान की बात कहते हुए वसूली का आदेश निकाला था।

प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का अभाव

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याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी करते हुए अधिवक्ता अनिरुद्ध प्रसाद पांडे ने अदालत में तर्क दिया कि चूंकि मूल वेतन संरचना को सक्षम अधिकारियों ने स्वयं मंजूरी दी थी और इसमें कर्मचारी की ओर से कोई धोखाधड़ी नहीं थी, इसलिए वर्षों बाद राज्य सरकार इस राशि की वापसी की मांग नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने इस रुख को स्वीकार करते हुए निष्कर्ष निकाला कि राज्य सरकार कर्मचारी की किसी भी गलती को साबित करने में विफल रही है। इसके साथ ही, बिना कारण बताओ नोटिस दिए और बिना पक्ष रखने का अवसर प्रदान किए रिकवरी का आदेश पारित करना प्राकृतिक न्याय और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता के मूलभूत सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।

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