पीएमके चुनाव चिन्ह विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने रामदास को सिविल कोर्ट जाने का दिया निर्देश, तीन दिनों में फैसले का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें पट्टाली मक्कल काची (PMK) के आंतरिक नेतृत्व विवाद में दखल देने से इनकार कर दिया गया था। कोर्ट ने पार्टी संस्थापक एस. रामदास को तमिलनाडु और पुडुचेरी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के लिए ‘आम’ (Mango) चुनाव चिन्ह के उपयोग के संबंध में सिविल कोर्ट से राहत मांगने का निर्देश दिया है।

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग (ECI) किसी अपंजीकृत राजनीतिक दल के भीतर चुनाव चिन्हों के आवंटन से जुड़े विवादों का निपटारा नहीं कर सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी पीड़ित पक्ष को “बिना उपचार के नहीं छोड़ा जाना चाहिए।” इसी को ध्यान में रखते हुए, शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि यदि मंगलवार, 24 मार्च तक सिविल कोर्ट में आवेदन दायर किया जाता है, तो उस पर तीन दिनों के भीतर फैसला लिया जाए।

यह कानूनी लड़ाई पीएमके संस्थापक एस. रामदास और उनके बेटे अंबुमणि रामदास के बीच चल रहे वर्चस्व के संघर्ष का परिणाम है। पिता एस. रामदास ने अपने बेटे को पार्टी के नाम, झंडे और ‘आम’ चुनाव चिन्ह का उपयोग करने से रोकने के लिए कानूनी गुहार लगाई है। गौरतलब है कि अंबुमणि को पिछले साल सितंबर में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था, लेकिन वे अभी भी खुद को पार्टी अध्यक्ष बताते हैं।

एस. रामदास ने अदालत से मांग की थी कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह या तो उनके गुट को चुनाव चिन्ह का उपयोग करने दे या उसे पूरी तरह से फ्रीज (Freeze) कर दे, ताकि अंबुमणि का गुट भी इसका लाभ न उठा सके। तमिलनाडु में 23 अप्रैल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान होना है, जिसके नतीजे 4 मई को आएंगे।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश मद्रास हाईकोर्ट के 20 फरवरी के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया है, जिसमें रामदास की याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की इस दलील को स्वीकार किया था कि अपंजीकृत दलों के भीतर गुटीय विवादों को केवल सिविल कोर्ट की डिक्री के माध्यम से ही सुलझाया जा सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी की, “हाईकोर्ट का यह मानना सही प्रतीत होता है कि एक गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो प्रतिद्वंद्वी समूहों के बीच चुनाव चिन्ह के आवंटन से संबंधित विवाद का फैसला भारत निर्वाचन आयोग द्वारा नहीं किया जा सकता।”

सुनवाई के दौरान पीएमके की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने तर्क दिया कि यदि चुनाव आयोग बिना किसी स्पष्ट निर्देश के चुनाव चिन्ह को ‘अनफ्रीज’ कर देता है, तो लॉटरी सिस्टम के माध्यम से वह चिन्ह किसी को भी आवंटित किया जा सकता है। उन्होंने जोर दिया कि अंततः चुनाव आयोग को ही पार्टी के चिन्ह पर अंतिम मुहर लगानी होगी।

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दूसरी ओर, विभिन्न पक्षों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा, मुक्ता गुप्ता और श्याम दीवान ने दलील दी कि चुनाव आयोग के पास अपंजीकृत दलों के विवादों में न्याय करने की शक्ति नहीं है, इसलिए यह मामला केवल सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद अब गेंद सिविल कोर्ट के पाले में है। अदालत ने कहा, “यदि ऐसा आवेदन कल यानी 24 मार्च, 2026 तक दायर किया जाता है, तो हम सिविल कोर्ट को निर्देश देते हैं कि वह सभी पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुसार तीन दिनों के भीतर इस पर निर्णय ले।”

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पीठ ने यह भी साफ किया कि उसने मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। सिविल कोर्ट सभी पक्षों की दलीलों और पीएमके महासचिव वदिवेल रावणन जैसे पक्षकारों की दलीलों को सुनने के लिए स्वतंत्र है।

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