लॉटरी टिकटों पर दी जाने वाली छूट ‘कमीशन’ नहीं; मद्रास हाईकोर्ट ने कहा- धारा 194G के तहत TDS का दायित्व नहीं

मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि लॉटरी टिकटों के अंकित मूल्य (Face Value) और उस रियायती दर, जिस पर वे वितरकों को बेचे जाते हैं, के बीच का अंतर “कमीशन” की श्रेणी में नहीं आता है। इसके परिणामस्वरूप, अदालत ने निर्णय लिया कि ऐसे लेनदेन पर आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 194G के तहत स्रोत पर कर कटौती (TDS) करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं बनता है।

जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस शमीम अहमद की खंडपीठ ने राजस्व विभाग द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) के आदेशों को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रतिवादी, मेसर्स मार्टिन लॉटरी एजेंसीज लिमिटेड, विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा प्रायोजित लॉटरी टिकटों की खरीद और बिक्री के व्यवसाय में लगी हुई थी। मूल्यांकन वर्ष 1999-2000 के दौरान, निर्धारिती (Assessee) ने ₹1.00 के अंकित मूल्य वाले टिकटों को अपने एजेंटों और डीलरों को ₹0.76 और ₹0.77 की दर से बेचा था।

निर्धारण अधिकारी (AO) ने बिक्री मूल्य और अंकित मूल्य के बीच के इस अंतर को एजेंटों को भुगतान किया गया “कमीशन” माना। 25 मार्च 1999 को, AO ने धारा 194G के तहत TDS काटने में विफल रहने के आधार पर आयकर अधिनियम की धारा 201(1) और 201(1A) के तहत ₹2,19,58,083 की मांग और ₹6,68,785 का ब्याज निर्धारित किया।

शुरुआत में तकनीकी आधार पर अपील खारिज होने के बाद, वित्त अधिनियम में संशोधन के बाद की गई अपील को आयकर आयुक्त (अपील) ने स्वीकार कर लिया और मांग को रद्द कर दिया। इस निर्णय को अगस्त 2005 में ITAT ने भी सही ठहराया, जिसके बाद राजस्व विभाग ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता (राजस्व विभाग): राजस्व विभाग का तर्क था कि निर्धारिती और डीलर के बीच का संबंध “विक्रेता” और “खरीदार” का नहीं था। विभाग ने दलील दी कि चूंकि डीलर बिना बिके टिकट वापस कर सकते थे और केवल बिके हुए टिकटों के लिए ही अंकित मूल्य से कम दर पर भुगतान करते थे, इसलिए उनके पास बचा हुआ “मार्जिन मनी” वास्तव में एक कमीशन था। अतः, इस पर धारा 194G लागू होनी चाहिए।

प्रतिवादी (निर्धारिती): निर्धारिती ने तर्क दिया कि ये लेनदेन “प्रिंसिपल टू प्रिंसिपल” (Principal to Principal) आधार पर की गई सीधी बिक्री थी। उनका कहना था कि यहाँ नियोक्ता-कर्मचारी या प्रिंसिपल-एजेंट जैसा कोई संबंध मौजूद नहीं था। प्रतिवादी के वरिष्ठ वकील ने कहा कि अंकित मूल्य पर दी गई छूट कानूनन “कमीशन” नहीं कहलाती है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने धारा 194G की वैधानिक आवश्यकताओं की समीक्षा की, जो लॉटरी टिकटों का स्टॉक रखने या बेचने वालों को “कमीशन, पारिश्रमिक या पुरस्कार के रूप में किसी भी आय” का भुगतान करने वाले व्यक्ति पर लागू होती है। खंडपीठ ने टिप्पणी की:

“आयकर अधिनियम की धारा 194G के तहत किसी निर्धारिती को TDS काटने के लिए उत्तरदायी बनाने हेतु, यह आवश्यक है कि निर्धारिती कमीशन के भुगतान के लिए जिम्मेदार हो और वह आय प्राप्तकर्ता के खाते में क्रेडिट के माध्यम से या नकद, ड्राफ्ट या किसी अन्य माध्यम से दी गई हो।”

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हाईकोर्ट ने पाया कि निर्धारिती ने राज्य सरकार से थोक में टिकट रियायती दर पर खरीदे और उन्हें अपने डीलरों को लाभ मार्जिन पर बेचा। अदालत ने नोट किया कि निर्धारिती ने कभी भी डीलरों के खातों में कोई “कमीशन” जमा नहीं किया था।

केरल हाईकोर्ट के एम.एस. हमीद बनाम निदेशक, राज्य लॉटरी मामले का उल्लेख करते हुए खंडपीठ ने कहा:

“टिकट 28 प्रतिशत की छूट पर दिया जाता है, इसे किसी भी तरह से इस व्याख्या के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता कि 28 पैसे का दस प्रतिशत कर के रूप में काटा जाना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम फ्यूचर गेमिंग सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि जब टिकट रियायती मूल्य पर बेचे जाते हैं, तो खरीदारों पर एजेंट के रूप में कर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वहां एजेंसी के तहत कोई लेनदेन नहीं होता है।

खंडपीठ ने करदेयता की प्रकृति पर आगे कहा:

“किसी व्यक्ति पर कर इस आधार पर नहीं लगाया जाता कि वह अपनी जेब में क्या बचाता है, बल्कि इस पर लगाया जाता है कि उसकी जेब में क्या आता है… जब यह स्पष्ट है कि लॉटरी टिकटों की खरीद के समय निर्धारिती द्वारा डीलर को कमीशन का कोई भुगतान नहीं किया गया है, तो धारा 194G लागू नहीं होती है।”

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निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह लेनदेन “कमीशन” की परिभाषा में नहीं आता क्योंकि यहाँ संपत्ति का हस्तांतरण विक्रेता से खरीदार को हुआ था। चूंकि निर्धारिती द्वारा डीलरों को वास्तव में कोई राशि कमीशन के रूप में भुगतान या क्रेडिट नहीं की गई थी, इसलिए धारा 194G के तहत मांग टिकने योग्य नहीं थी।

राजस्व विभाग की अपील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा, “हमारा मानना है कि प्रतिवादी/निर्धारिती आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 194G के तहत स्रोत पर कर कटौती (TDS) करने के लिए उत्तरदायी नहीं है और फलस्वरूप, निर्धारिती के खिलाफ धारा 201(1) और 201(1A) के तहत कार्यवाही नहीं की जा सकती।”

मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: आयकर आयुक्त, कोयंबटूर बनाम मेसर्स मार्टिन लॉटरी एजेंसीज लिमिटेड
  • केस संख्या: टीसी संख्या 955 ऑफ 2008 (TC No. 955 of 2008)
  • कोरम: जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस शमीम अहमद
  • दिनांक: 09 अप्रैल, 2026

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