दोषसिद्धि के बाद भी समझौते के आधार पर खत्म किया जा सकता है चेक बाउंस का मामला: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act), 1881 की धारा 138 के तहत आने वाले अपराधों में दोषसिद्धि (Conviction) की पुष्टि होने के बाद भी समझौता किया जा सकता है। जस्टिस बी. पुगलेंदी ने एक याचिका को स्वीकार करते हुए 10 महीने की जेल की सजा को रद्द कर दिया, क्योंकि आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच आपसी सहमति से विवाद सुलझ गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले की शुरुआत पलानी स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट (फास्ट ट्रैक कोर्ट) के समक्ष लंबित केस S.T.C. No. 10 of 2022 से हुई थी। 30 अक्टूबर, 2023 को ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता एस. सेंथिलसेल्वी को दोषी करार देते हुए 10 महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही, शिकायतकर्ता आर. जयकुमार को 8,75,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था।

याचिकाकर्ता ने इस फैसले को जिला अदालत में चुनौती दी, लेकिन Crl.A. No. 136 of 2023 में अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद हाईकोर्ट में दाखिल की गई पुनर्विचार याचिका (Revision) भी 28 अगस्त, 2025 को खारिज हो गई। सभी कानूनी रास्ते बंद होने के बाद, याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में एक नई याचिका दायर की, जिसमें समझौते के आधार पर मामले को खत्म (Compound) करने की मांग की गई।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वकील श्री ए.के. अज़गर सामी और श्री के. कर्णन पेश हुए। उन्होंने कोर्ट को सूचित किया कि पक्षकारों के बीच समझौता हो गया है और अब कोई विवाद शेष नहीं है।

शिकायतकर्ता की वकील सुश्री एस. ममता ने समझौते की पुष्टि की और कहा कि उनका पक्षकार अपराध के शमन (Compounding) के लिए तैयार है। कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता ने 9 अप्रैल, 2026 को डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से 6,00,000 रुपये का भुगतान कर दिया है, जबकि शेष राशि मुकदमे के शुरुआती चरणों में ही कोर्ट में जमा करा दी गई थी।

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कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

जस्टिस बी. पुगलेंदी ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों का अवलोकन किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि चेक बाउंस का अपराध अर्ध-आपराधिक (Civil in criminal nature) होता है, जिसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग लेनदेन की विश्वसनीयता बनाए रखना है।

कोर्ट ने कहा:

“इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध शमनीय (Compoundable) प्रकृति का है और पक्षकारों के बीच हुए समझौते को देखते हुए, यह अदालत अपराध के शमन की अनुमति देना उचित समझती है।”

अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट, निचली अपील अदालत और हाईकोर्ट के पिछले आदेशों को रद्द कर दिया। इसी के साथ याचिकाकर्ता को आरोपों से बरी कर दिया गया और मामले को आधिकारिक तौर पर ‘कंपाउंड’ (Compounded) घोषित कर दिया गया।

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केस विवरण विवरण

  • केस टाइटल: एस. सेंथिलसेल्वी बनाम आर. जयकुमार
  • केस नंबर: Crl.OP. (MD) No. 7749 of 2026
  • बेंच: जस्टिस बी. पुगलेंदी
  • दिनांक: 21 अप्रैल, 2026

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