उन्नाव कांड: सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट को तीन माह में फैसला करने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह भाजपा से निष्कासित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उस अपील पर प्राथमिकता से सुनवाई करे, जिसमें उन्होंने उन्नाव बलात्कार पीड़िता के पिता की हिरासत में हुई मौत के मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस याचिका का निर्णय तीन महीने के भीतर किया जाए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सेंगर की उस विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के 19 जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने उस आदेश में सेंगर की 10 साल की सजा को निलंबित करने से इनकार कर दिया था।

सुनवाई के दौरान, पीठ ने पीड़िता के वकील द्वारा मीडिया को दिए गए बयानों पर नाराज़गी जताई। सीजेआई ने कहा, “हम हाथी के दांत नहीं हैं जो दिखाने के और हों और खाने के और। हमें पता है कि बाहर मीडिया ट्रायल चल रहा है। कोर्ट के बाहर कोई समानांतर ट्रायल नहीं चलेगा, मैं इसकी इजाजत नहीं दूंगा।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर पीड़िता पक्ष ने भी कोई अपील दाखिल की हो तो हाईकोर्ट उसे भी इसी अपील के साथ सुने। मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में 11 फरवरी को होनी है।

13 मार्च 2020 को दिल्ली की एक सत्र अदालत ने सेंगर को आईपीसी की धारा 304 (ग़ैर इरादतन हत्या) के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की कठोर कारावास और ₹10 लाख जुर्माने की सज़ा सुनाई थी। अदालत ने कहा था कि “परिवार के एकमात्र कमाने वाले की हत्या के लिए कोई नरमी नहीं बरती जा सकती।”

पीड़िता के पिता को 2018 में आर्म्स एक्ट के तहत सेंगर की सिफारिश पर झूठे मामले में गिरफ्तार किया गया था और पुलिस हिरासत में मारपीट के चलते उनकी मौत हो गई थी। अदालत ने यह माना कि हत्या की मंशा नहीं थी, लेकिन पुलिस की बर्बरता से मौत हुई।

2019 में एक अन्य मामले में सेंगर को पीड़िता के अपहरण और बलात्कार के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर 2025 को उस मामले में सजा को अपील लंबित रहने तक निलंबित कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को उस आदेश पर रोक लगा दी थी।

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दोनों मामलों में सेंगर की अपीलें दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हिरासत में मौत के मामले में सुनवाई को प्राथमिकता मिलेगी और फैसला आगामी तीन माह में अपेक्षित है।

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